समीकरण मीमांसा | Samikaran Mimansa

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Samikaran Mimansa by सुधाकर द्विवेदी - Sudhakar Dvivedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १३ ) हे । जिनमें मुख्यतः समीकरण में श्रव्यक्त के धनणेमान श्रौर - असम्भव माने को सीमांसा और चिन्ह रीति हैं (४ वाँ प्रक्रम ` देखो ) डेझाट ने दा वगगंसमीकरण के गशुणनफलरूप में एक चतु- घोत समाऋरण के ले आने को युक्ति को भी दिखलायां है। ' यद्यपि यह युक्ति फेरारी के प्रकार से भी निकल आती है तथापि व्यवहार में उपयोगी है (१२४ वाँ प्रक्रम रेखा) । सन्‌ १७७० ई० में आयल्लर ( (5००7 ) ने एक वीजगखित बना कर प्रकाश क्रिया । उसमें चतुधोत रूसीक'ण तोड़ने के लिये उत्तम प्रकार दिखलाया गया है ओर साथ ही साथ सिद्ध - किया गया है कि चतुधोत समीकरण का तोड़ना एर घन समीकरण के आधोन है अथोत्‌ यदे उस्र घनसमी करण के अत्यक्त- . मान विदित दो जाय तो चतुधोत समीकरण के अव्यक्तमान भी विदित होः सकते है (१२२ वाँ प्रकम देखो) । डेट ` श्रोर आयलर के प्रकारों के देख कर बहुतों को इच्छा हुई कि चतुधोत से ऊपर के घातवाते समाहरण के तोड़ने का प्रकार निकाल । इसके लिये अठारइवीं शताठिद तक प्रयत्न किया गया पर सब निष्फत्न हुआ | ` पश्चात्‌ वाग्डरमाण्डे (৬৪006000939) ओर ভরাসাঁওহ 1 1:78-.. 72025) ने भी क्रम से सन्‌ १७७० और ६७७१ इ० में इस विषय | पर अत्यन्त उपयोगी बातों के पने अपने लेखों में प्रकाश चषि : अन्त में आबेल (8००!)ओऔर बान्टसेल ( ४५४००८८6] ) ने सिद्ध किए कि चतुघोत से अधिक घातवाले समीकरणों के तोड़ने की साधारण विधि बीजगणित की युक्ति से असम्भव है ( 016 5०प- . 01019 1001 00851015 ४ 18416515 210109, ০0৩৮৪. (০ম [07451590065 -১501১9090100 4১7৮ 510 देशो) - तत्पश्चात्‌ यूरप के अनेक विद्वान अनेक नये नये सिद्धान्तो ~ ऊ! उत्पन्न किए और आज़ तक करते ही जाते हैं जिनके कारण




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