वक-संहार | Vak-sanhaar

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
1 MB
कुल पष्ठ :
59
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)वक-सहार२६ |में सुत-सुता भी जन चुकी,
कुल-बर्धिनी हूँ बन चुकी।
मेरे बिना अव हानि क्या संसार की ?
इस हेत जने दो सुभे,
यह पुण्य पाने दो জুল”
जिससे कि रक्षा हो सके परिवार की ।
[ २७ ]
मे एक तुम मे रत यथा,
तुम एक पत्नीत्रत तथा ।
में जानती हूँ, तुम कहो न कहो इसे ।
पर तुम पुरुष हो, धीर हो,
ज्ञानो, गुणी, गम्भीर | |
तुम सह सकोगे मै न सह सकती जिसे !१६
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