बुढेमुँहमुंहासे | Budemuhmuhase

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Budemuhmuhase by काशी - Kashi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १४ ) [ सितावी का प्रवेश ] ঘিনালী-_( घारोंभ्रोर देखकर ) धू घू ! सुम॒त्मान के घर में आकर ऐ तो उलटी होय है। घू घु! सर्गा हे पड, प्याज के छिलका । छि; छिः| पर कहा करू लाला जाने कब ये पाप छोड़ेंगे । इतने बूढ़े हो गये पर श्रव तक सन में ज्वान पहाही बने हैं 1 आज तीन घरस से नोकरी करूँ हूँ इतने दिन में कितने भले घर की वेह वटो, राइ, सुदागन, सनै खराव करी, कछू ठीक नहों ( हँसकर ) फिर लाला भगत सो बड़े, दिन भर साला हाथ सेद्धो रक्छे, सोसवारको एकादशी को वत्ते करे । श्राद्ा! कैसी भक्तो} ( चिन्तारे) भला जो भ्द सो भई, यह तो ठोक करं किया लुगाई की कुछ बुरो भक्तो कर सकंगी कि नहीं | चेंना तेली छी वेंटो से यह सब वात नहीं बनेगी वो गरीब জাক্রান্ को छोरी थोड़ेंह्ी है, जो रो चार रुपया देखकर ना- चने लगे । और लाला ज्वान होते, तव भी कुछ वात नहीं, नन्नो गुस्सा होती, तो हईंसो में बात ठाल देती.। अच्छी देखूं यद्द कहा कहे। (ऊँचे ख़र से पुकारकर) अरो छलन्नो , घर में है ? 1 লদভ से | अरो कोन है ?




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