रविन्द्र साहित्य भाग १२ | Ravindra Sahitya Bhaag 12

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Ravindra Sahitya Bhaag 12  by धन्यकुमार जैन - Dhanyakumar Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आखिरी कविता বসি और उससे जो प्रकाश छिठक निकलता है उसे कहते हैं 'कलचंर,। परमे भार है, भौर प्रकाम दीप्ति ॥/ ही लिसी गुस्सेमें आकर कहती--“हुंहू, बिमी बोसका आदर नदौ इनके मन्म, ये खुद दही क्या उसके योग्य है} तुम अगर बिसी बोससे ब्याह करनेके लिए पागल भी हो ठठो, तो में उसे सावधान कर देगी कि वह तुम्दारों तरफ मुह फेरके ताके भी नहां।”” अमित कहता--“पांगल बगर हुए बिमी बोसके साथ व्याह करना चाहूँगा हो क्यों? उस समय मेरे ब्याहकों चिन्ता न करके योग्य निकित्साकीो ही चिन्ता करनी होगी 1” अत्मोय-खजर्नोनि तो अमितके व्याहकी आशा छोड़ ही दी है। उन लोगोंने तय कर ভিসা है জি ब्याहकी जुम्मेदारी लेनेकी योग्यता उसमे नदी है, इसीसे वद सिफं असम्भवका खप्र देखकर भौर उलरो बातें कहकर आदमीको चौका फिरता है । उसका मन्‌ আউাক্কা সঙ্কাহা है, मैदान या रादे धोखा हो दिया करता है उसे परकड्के घरमे नहीं खया जा सक्तु । হুল दिनो अमित जहाँ-तहाँ- हा-हा हु-हू करता फिरता है , धकरपो' कौन दुकानमे जिसे-तिसे चाय पिछाया करता है, - और जब तब मित्नोंको मोटरमे चढाकर अनावश्यक घुसा लाता है । यहाँ- वहाँसे चाहे जो चोज खरीदता और चाहे जिसको बाँट देता है ; ओर्‌ अगरेजी करिता दाल-की-दाल खरीदकर चाहे जिस घरमे डाल आता है, फिर लाता हो नहों। ४ लक, सिथ्यार्िति1 विचाश-दीपिका । ” 1 कलकत्तेका एक प्रसिद्ध अगरैजी होटल ।




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