रवीन्द्र साहित्य भाग ११ | Ravindra Sahitya Bhaag 11

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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देवयानी-- कच -- देवयानी-- असिशाप-गरस्त विदा : कान्य ' भूलना न गर्वमें। सुधाते बढ़ सुधामय डुग्थी उसका है। होता दशंनसे पापक्षय । मातृ-रूपा शान्ति-मूति पयस्विनी युध्रक्रानित 1 उसकी की सेव मने त्याग श्रा वृष्णा श्रान्ति। गहन वेरनमे शस्य - दयाम खोतस्विनी तीर फिरता रहा हू सग उसके में घर धीर अनुदिन । निम्न तट - भूमिपर परिव्याप्त दरित सदु হিল तृणराशि अपर्याप्त चरती श्री यथातृप्ति, फिर अलसाई हुईं चलती थी मन्द-मन्द লন ভি ভাই हुईं, और किमी तस तले छाया देख सुखकर करती रोमन्थ वेठ जाती हरी दूबपर । सकृतज्ञ बडी - बढ़ी आँखें निज खोल वह्‌ स्नेदवश मेरी ओर देख लेती रद्द - रह , अपनी कृतज्ञतासे দূ शन्त दष्ट द्वारा वात्सल्यसे चाटतो थी मानो मेरा तन सारा। स्मरण रहेगी वह दृष्टि स्निग्ध अविचल चिकनी सुपुष्ट श॒ुत्र भरो देह समुज्ज्वल । क्लक्रल-वती रेणुमतीको न भूल जाना। भूल जाऊँगा में उसे, भला यह केसे माना? कितने ही इसुम्तित कुल - पु पार कर आनन्दन मधुर गलेमे करू মান भर बद्दती है यहाँ सेवा - पगी स्रासवधरू सम क्षिप्रगति युभव्रता प्रवात - सगिनी मम। दाय बन्धु, यहाँके अ्रवास-कालमें क्या, कह्दो, एसी भी तुम्हारी कोई सहचरी रहो, अहो, २१




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