पृथ्वी और आकाश | Prithvi Aur Akash

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Prithvi Aur Akash by शमशेर बहादुर सिंह - Shamsher Bhahdur Singh

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about शमशेर बहादुर सिंह - Shamsher Bhahdur Singh

Add Infomation AboutShamsher Bhahdur Singh

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
স্১ न कत =| ১ “নহ में तो वस त॒म्हें चाकलेट देने के लिए एक मिनट को टुम्ार पास दोढ़ा चन्चा आप ; अब सुर जाना ह। ढंरों काम मेरे सर पर টং হাঁ लुः ५. नाग हज ~ शर्य ४५१ পি ০৬. ५ ह तक कामक अपने का रागाये रइज। अब मुझे देरी नहीं उस स्त्री ने रूखा-रा सह दना लिया। अकेले, अकेले, सारे दिन अकेते...आभशिर कव यह लड़ाई ख़त्म होगी £ ख़त्म हो जायगी |? “म्हार लिए तो बातें ही बनाना आसान है . ? उसने लिपय हुआ रंगीन कागज खोला ओर चाकलेट के अंदर अपने या नोकीले दाँत गड्ा दिये ; पूर लवे ठुकढ़े से तोड़कर नहीं लिया, उसी में दाँत से काटकर खाने लगी | ग्रामोफ़ोन पर रेकाडइ चढ़ा दो। खाना तुम्हारा यहीं तुम्हार पास आ जाएगा। अच्छा, गुब्बाई |? उसने लायरबाही से उसको चूमा ओर बाहर चला गया। संतरी अभी तक मकान के आगे ज़ोर-ज़ेर से कृदमन प्रठकता हुआ गश्त लगा रहा था जिससे परों में गर्माहट आ जाय । श्रफसरको देखते दी एकदम फौजी क्रायदे से साधा तनकर खड़ा हो गया | कप्तान उसके बराबर से निकला ओर चौराहे की तरफ़ मुड़ गया । जिस बड़ी-सी इमारत में पहले ग्राम-पंचायत, की बेठके होती थीं, वह अब सिपाहियों, ओर' गेर-कमीशन अफ़सरों से भरी हुईं थीं | सबके सब सीधे तनकर खड़े दो गये ओर सबों ने सलामी दी | उसने बराय- नाम उनकी सलामी का जवाब दिया। कमरा नीले धरणे के बादलों पे धुंधला हो रहा था | धक्का देकर अफ़सर ने उस कमर का दरवाज़ा खोला जो अब उसका आफ़िस था | धअ्रंदर लाओ उस औरत को |! बह मेज़ के पास जाकर बेठ गया और एक जः पूस्या पर उसे ईष्या दो रदी थी जो विस्तरे इस वक्त तक भी चेन से पड़ी रह सकती थी ডি পপ




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now