योग एक चिंतन | Yog Ek Chintan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
9 MB
कुल पष्ठ :
286
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)' एते जाति-देश-काल-समयानवच्छिन्ना सार्वभीमा महाव्रतम्
कह कर अहिसा- ग्रादि को सावंभौम महात्रत कहा गया है और
उन्हें सभी देशों सभी जातियो और सभी कालो ' के लिये आरा-
धनोय कहा है । *नियम के श्रन्तर्गत शीर्च, सन््तोष, तप, स्वाध्याय, ईरवर-
प्रणिधान को लिया गया है | ३३ बे सूत्र मे हिसा के कृत, कारित
अनमोदित रूप की चर्चा की गई है । इत्यादि 'समस्त वणन इस
নাল को प्रमाणित करतो है कि पत्तजलि योग के क्षेत्र पे भगवान
महावीर से तीन सी वेषे बाद उनकी शब्दावली और उनको घ्यान-
प्रक्रिया से प्रभावित्त हुए और उत्होने उन्ही की साधना-पद्धति का
आश्रय लेकर योग-दर्शन की रचना की ।प्रस्तुत पुस्तक में उपाध्याय श्रमण श्री फूलचन्द्र जी महाराज
ने बत्तीस योगो को जो क्रमबद्ध व्याख्या की है वह व्याख्या योग-
दर्शन की गली में दुष्टिगोचर होती है, श्रत जो साधक योगी
वनना चाहता है, उसके लिये श्रस्तुत पुस्तक का क्रमबद्ध स्वाध्याय
उपयोगी होगा यह निश्चित ই । -ध्य{न-योगपतञ्जलि का योग-दर्शन ध्यानयोग का समग्र रूप है। ध्यान
साधना के क्षेत्र का प्राण है। कोई भी साधक इसके बिमा साधना
मार्ग पर सफलता प्राप्त नहीं कर सकता । विश्व मे जितने भी
अध्यात्म का श्राधार लेकर चलने वाले सम्प्रदाय है, उनमे श्रनेक
सैद्धान्तिक मत-भ्ेद हैं, किन्तु ध्यान मे कही किसी का कोई मतभेद
नही है। समी धर्म-सम्प्रदायो को ध्यान मान्य है।यह. विकासशील ' मानव जेसे-जेसे वाह्य ससार में बढ़ता
योग” एक चिन्तन ] [ सतह
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