महाकवि शूदक | Mahakavi Shoodak

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Mahakavi Shoodak  by रमाशंकर तिवारी - Ramashankar Tiwari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(५) अतएव, यह स्पष्ट हो जाता है कि 'अभिरूपपति' नामक ब्रत की व्यवस्था से 'मूच्छ०* मे सूत्रघार के अमर्प का जो क्षणिक चित्र उपनिबद्ध हो गया है, অজ ঘুম मे चारु०' का यह स्थछ फ़ोका एवं नोरस बन गया है । अतएव, 'मृच्छ०' वी प्रस्तावना 'चारु०' की स्वापना की छुलना में नाट- कोयता की दृष्टि से श्रेष्ठ 5हरती है । लेकिन, एक अनोखी बात द्र॒प्टम्य यह है कि चाष के कतिपय चित्र सौददर्य दृष्टि से 'मृच्छ०' के सम्रान चित्रों की अपन्षा श्रेष्ठतर घिद्ध होते हैं। उदाहरण निम्नाक्षित हैं -- (व ) “किप्णपु खु अज्ज पच्चुय एब्व गेहादो णिक्छननस्ह बुमुर्खाए्‌ पुजजरप्तपडिदजलदिदू विश चचलाअन्ति विश्व मे अफ्वीणि ।” --+ वैयो आज उधाकाल में ही घर से बाहर होते हो मेरी गाँखें भूख के कारण कमल के पत्ते पर पडे हुए जलविन्दु को भांति चंचल हो रही हैं !! ( 'चारुदत्त' ) “अनेन चिरमगोतोपासनेन प्रीप्मसमदे शचण्डदिनकरकरिरणोच्दुष्क पुष्कर चौजमिव प्रचरितिनारके क्षुघ्र मम्राशिणी खटखटायेते 1” +- सगौत की विर-साधना के कारण, गर्मो के दिन में त्तीक्ष्य सूर्य की किरणों पे अत्य'त मूसे हुए कमछ के बीज के समान चचऊ पुतछी बाली मेरी আর মুল से विचल्नि हो रही हैं ।' ( “मृच्छक्टिक ) “विरसगोदेदासणेण सृुक्खपोरवरणालाद तिभन मे वुमुश्वाए्‌ मिलाणाई सगाई ~ अधिक्‌ काल तक सगीत के अभ्याप्तसे समवे कमल दडके-समानमेरै अंग भूख से विवर्ण हो गए हैं ।' ( 'मृच्छ०--प्राकहृत बश ) मूल से आँखों के चचल होते का तथ्य लोक-व्यवहार में प्रचलित है, “मूख से आँखें नाच रही है,' ऐसा हम प्रायः कहते और सुनते हैं। इस्त तथ्य की विज्ञप्ति के लिए “चार०' में कूमरूपत्र पर पड़े चचल অভি কা उपमान छाया गया हैं जबकि 'मृच्छ०' के सह्द्ठाश में सूर्य की तीक्ष्य किरणों से सूखे कमल-बीज वो योजना है| सूसे क्मत्नवीज से आखो का निष्प्रम होना झोतित है, कितु नाटककार का अमीष्ट बाँचो का चाचल्य ही है. “प्रवल्ति- तारके छुघा ममाक्षिणी खटखटायेते ?” तब, इस चाचल्य-योतन के लिए * उच्टुष्कपुष्करदीजमिव” की योजना झिपिल कही जाएगी शोर इसको तुन्ना में 'चादु० का चित्र प्रत्यभ एव प्राजछ समझा जाएगा ॥




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