ब्रह्मसूत्राणि | Brahmasutrani

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Brahmasutrani by श्री कृष्णदास श्रेष्ठिना - Shri Krishnadas Shreshthina

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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৬ ॐ अथ ब्रह्मसु ाणि. भाषाटीकासहितानि । नदि अ (य प्रथमोऽध्यायः १. प्रथमः पादः । ॐ-अथातो ब्रह्मजिज्ञाप्ता ॥ १ ॥ रणस्य सचिदानंद गुरं चाज्ञाननाराकम्‌ ॥ सारार्थबह्मसूत्राणां कथयामि यथामति ॥ 4 ॥ इस सृत्रके-अथ१अतःर बल्लानिज्ञासा श्यह तीन पद हैं ॥ अथे शब्दका आनंतये अर्थं दे । अतः शब्दका हेतु अथं हे । ब्रह्मजिज्ञासा शब्दका अर्थ ब्रह्को विषय करनेवाली इच्छा हे । केन्य पदका अध्याहार करना ॥ तथाच ॥ यस्मात्‌ अगिहोादिकोंका फर जो स्वगांदिकं सो अनित्य है तस्मात धर्मजिज्ञासाके अनंतर अथवा साधनसंपत्तिके अनतर ब्रह्मकी जिज्ञासा ( जाननेकी इच्छा ) करनी अथवा ब्रह्मका विचार करना यह सूत्रका साराथं है ॥ १॥ प्रथम तमे कदा है फ जद्मकी जिज्ञासा युधुश्चु पुरुषको करने योग्य है तिस ब्रह्मका लक्षण क्या है अतः भगवान सूत्रकार त्रह्मको तटस्थ रक्षण कहते दं ॥




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