छुट्टी का दिन | Chhutti Ka Din

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Chhutti Ka Din by सत्येन कुमार - Satyen Kumar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अशरफका जवाव और भी मजेदार था--प्रूरा मजा तो खैर अल्ला मियाँ ही चखाते है आखिरमे* “लेकिन प्यारे, जो सवाल तुम पूछ रहे हो उसके लिए तुम्हारी उस्न मभी जरा कच्ची है क्या समझे ? एक भौर बड़े खास ग्राहक थे हमारे--पहाडगंज मे उनका एक सिनेमा था। बे तो धीरे-धीरे हम लोगो के थोक ग्राहक हो गये थे और साथ ही उन्होने हमारी स्कीम का बिजनेस पक्ष भी हरमे सुञ्ञाया ! वकौल उनके--तुम दोनों तो यार करोदपति चन सक्ते टो इष्ठ धन्छे मे इस भुलकमे तो मादमी साला अपनी दीदी तक को नंगौ नही देख पाता । ओर फिर गोरी चमडी का भूत तो आदमी को चमार बना देता है। तुम तो बस लाये जाओ माल, विकवाना मेरी ड्यूटी है'** लेकिन उन दिनों तक हम लोगों का इरादा करोडपति बनने का था ही नही । और इतवार के दिन वैसे भी कई और जरूरी काम होते थे । प्लाजा और रिवोली सिनेमा में वारह से तीन बजे वाले शो मे अग्रेजी की पुरानी फिल्‍मे घटी दरों पर आती थी---उन्हें हम दोनों पाबन्दगी के साथ देखते थे। अंग्रेजी बोलने में सबसे ज्यादा मदद उन्हीं फिल्मों से हमे मिलती थी। शाम को चार से पाँच बजे तक कबाडी बाजार मे कमाई भौर उसके बाद सीघे--स्टेशन के सामनेवाली दिल्‍ली पब्लिक लायब्रेरी जहाँ इतवार की शाम स्कूल के बच्चो के लिए कई विशेष कार्यक्रम हेते भे मलन डिबेट, कई तरह की प्रतियो गिताएँ। रवि को हालाँकि उन कार्यक्रमों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी लेकिन फिर भी बह मेरे साय रहने की खातिर वहाँ चला जाता था। ग्यारहवी क्लास मे माते ही रवि ने मैक्सम्युलर भवने मे होने- वाली जन क्लासेज में दाखिला ले लिया था। उसे विदेशी भाषाओं को सीयने का शरू से बडा शौक था। ऐसा शायद इसलिए भी था कि उसने तय कर रखा था कि बह ज्यादा पढाई नहीं कर पायेगा और वैसे भी उसे डॉक्टर, इन्निनियर या अफसर वमे रा वनने मँ कोई दिलचस्पौ नटी यी । पने मे वैसे वंह बहुत तेज था और इसीलिए मैं अक्सर उससे कहता था कि उसे वी. एस-सी. करने कै बाद भाई. ए. एस. मे बैठना चाहिए क्योकि वद्‌ जरूर उसमे मा जायेगा और असली वात यह थी कि वह एक वहत अच्छा अरूमर वन सकता था । मेरी बात का हर बार वह एक ही जवाब देता था--तठुझे यार अवल कब आयेगी ? इतनी मुश्किल से तो मैंने उस यतीमखाने से जान छुडायी है । और तू कह रहा है कि फिर उसी तरह के यतीमखाने मे जिन्दगी-भर के लिये चला जाऊं! असल मे तूने सरकारी दफ्तर देखे नही हैं न इसलिए ठुझ्च पर ये अफसरी का भूत सवार रहता है। जिनको तू अफसर कहता है वो सब साले अपने-अपने यतो मखानों के मुनीमजी हैं *'समझा ? बहुरहाल मेरे बहुत कहते-सुनने पर रवि ने हायर सेकण्ड्री पास करने के बाद मेरे साथ ही हिन्दू कॉलिज मे दी. एस-सी. के पटले वर्ष मे दायिला ले लिया था! ইালাঁবি बाद में मु्ते सगा कि उसके दाखिला लेने की असली वजह कुछ और थी। कॉलिज का छात्र होने के नाते वह कोंलिज के हॉस्टल से रह सनता था। आटवी बलास से ग्यारहवी तक के दौरान उसे कई अलग-अलग घगहो में बड़ो परेशानियों छुट्टो का दिन /25




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