कर्म योग | Karm - Yog

Karm - Yog by स्वामी विवेकानन्द - Swami Vivekanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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फर्मयोग १६ उससे शक्ति हुममें लौटकर नहीं रा सकती, परन्तु यदि स्वेच्छा- निरोध किया जाय तो शक्ति बढ़ेगी । इस प्रकार के निरोध से वह मन:शक्ति उत्पन्न होगी, वह चरित्र बनेगा जिससे एक इंसा इसा घर एक चुद्ध बुद्ध दोता है । मूढ़थी यह रहस्य नहीं जानते ; फिर भो वे मनुष्य-जाति पर अपना प्रभुत्व स्यापित करना चाहते हें । मूर्ख यह नहीं जानता है कि वह भी यदि के करे ौर प्रतीक्षा करे, तो समस्त संसार का स्वामी हो सकता है । कुछ दिन पेय रखिये, स्वामीत्व के विचार का निरोध कीजिये ; जच बह विचार पूर्णत: चला जायगा तब ब्मापकों इच्छा-शक्ति से ब्रह्मारड शासित होगा । मनुष्य चार पेसे के पीछे अंधा बना घूमता है और उन छ्लुद्र चार पैसों के लिये घ्पने भाई मनुप्य को धोखा देने में तनिक थी 'झाया-पीछां नहीं करता ! परंतु यदि वह थेये घारण करे, तो वह ऐसा चरित्र बना सकता हैं कि इच्छा करने पर करोड़ों अपने पास बुला सके । परंतु इम सच ऐसे दी सूर्ख हैं । हममें से झधिकांश की कुछ दिनों के दृष्टि नहीं पहुँचती जैसे कि कुछ पशु दो-चार कदम के ब्यागें नहीं देख सकते । एक छोटा-सा च्त्त--यही हमारा संसार है | उसकी क्षितिल पारकर देखने का हममें पेय नहीं और हम पापी श्रौर अनाचारी हो जाते हैं। यही इसारी शक्तिद्दीनता, निरवलता है | छोटे-से-छोटे कामों से भी नाक-भीं न सिकोड़ना चाहिये । मनुष्य अपने स्वार्थ के लिये, घन और यश के ही लिये काम करे,




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