बलि का बकरा | Bali Ka Bakra

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Bali Ka Bakra by मन्मथनाथ गुप्त - Manmathnath Gupta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बलि का बकरा चोल उठी--श्रपना हक तो लेना ही चाहिये । इस में कौन बुराई है ? समी ऐसा करते हैं ।--कहकर उसने कम से कलछुल को एक थाली पर पटक दिया, शरीर बोली--जो कोई इतना धमीत्मा वने; तो उसे चाहिये कि वह साधू फुकीर हो जाय । गृहस्थों के लिये यह सम्मव नहीं कि वे श्रपना वाजिव हक छोड दें | पर ने इस सम्बन्ध में हॉ ना कुछ नहीं कहा । इस से मिरुत्ताह न हो कर होमवती श्रपनी बात घार चार कहती रही | दुकान तो खुलनी ही थी, श्रव उस में जल्दी होने लगी एक हफ्ते के श्रन्दर हजारीलाल की दुकान खुल गई । दुकान पहले ही से श्रच्छी चलने लगी, क्योंकि इस बीच में 'कस्वेवालीं को ही नहीं, दूर दूर तक श्रास पास के देहातों में भी यह खुबर फेल श्रुफी थी कि हजारीलाल ने किस उस दुकान से नौकरी छोड दी | यथपि सोनेलाल ने हज़ाएलाल द्वारा इतनी जल्दी दुकान खोले जाने पर कुछ नहीं कहा था, कि मी वह एक हृद तक की तनख्वाह पर निर्मर था | इस कारण मन में कुछ दुखी था | पर जब उसने श्रपने मकान के नीचे के हिस्से में यति परिचित दुक ठुक की सुनी; तो उसे श्रपने पिता के युग की याद हो गई | उसकी याखें भर श्रायीं, श्रीर उसे श्रच्छा सालूम हुधा । पढा लिखा होने के कारण वह भ्रपने को कुल का गौरव समझता था, पर इस समय ऐसा मालूम दिया कि जेसे वह उस छुल का है ही नहीं; शरीर उसका छोटा भाई ही कुल की परम्परा की रकता कर रहा है । वह श्रपने को छोटा करने लगा, पर इस से उसे दुख नहीं सुख ही हुआ । बात यह है कि हजारीलाल ने सब से कह दिया था कि दुकान उस की नहीं सोने लाल की है | इस के ग्रतिरक्ति उसने देखा कि दुकान शुरू से ही खूब चलने लगी, यहां तक फिं हजारीलाल को जल्‍दी ही दो कारीगर रखने पडे, फिर तो उस के मन में स्सी प्रकार का कोई पछतावा नहीं रहा |




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