तपते हुए दिनों के बीच | Tapte Hue Dino Ke Beech

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Book Image : तपते हुए दिनों के बीच  - Tapte Hue Dino Ke Beech
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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यात्रा-पंखुरी से नदी तकमैंने म्जलि में जल भर कर दिया जब तुम्हें अरध्यंतब तुम सुरजमुखी की तरह पंखुरी-पंखुरी खिल उठींफिर देखा कि सहसाउन्हीं पंखुरियों के बीच सेएक नदी उग्र आई है/दो होठों वाली गोरी नदी और उस दी होठों वाली गोरी नदी की लहरियां मुझ में परत-दर-परत यभमचलने को |बेचेन हो रही हैंक्यों अंजलि में उगती है दो होठों वाली गोरी नदी ? श्रौर क्यों उसकी लहरियांमुक मे परत-दर-परत)।मचलने कोबचेन हो उठती हैझौर फिर क्‍यों लगती है गोरी नदी के जल में आग ? इतना श्रथाह जलक्यों किनारे में समा जाता है ?क्यों उमड़ते हैं इतने वादल ?दो होठों वाली गोरी नदी के जल में क्यों लगती है ग्राग ? क्‍यों उगती है तुम्हारी खूशबूदार आंखेंमेरे आस-पासऔर क्यों मेरी अ्रांखों मेंप्यास की एक श्रवुभः पहचान जगा करछोड़ देती है देहराग !तपते हुए दिनों के बीच / ए




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