जवाहर-ज्योति | Jawahar Jyoti

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Jawahar Jyoti by शोभाचन्द्र भारिल्ल - Shobhachandra Bharill

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अह्मचर्य ९ अपूर्श व्रह्मचयं की साधना के हारा परं बरह्मचयं तक पहुँचा जा सकता है | श्री उत्तराध्ययन सूत्र के १६ वें अध्ययन की नियुक्ति में ब्रह्मचय के चार भेद बताये गये हैं। नास ब्ह्मचये, स्थापना अह्यचये, द्रव्य त्रह्मयय और भाव त्रह्मचय । जो लोग नाम से ब्ह्मचारी हैं पर ब्रह्मचय का पालन नहीं करते, उनके ब्रह्यचारीपन को शाख (नाम त्रह्मचये' कहते हैं | नाम के ब्रह्मचर्य से कछ भी होता-जाता नहीं है । उसके साथ भाष अह्यचर्य' का होना आवश्यक है | जो भाव से ब्ह्मचय का पालन न करते हुए मी नाम से ब्रह्मचारी कहलाते हैं वे दुनिया में सम्मान प्राप्त करने की कामना करते हैं । संसार में हीरा-मीती पहनने वालों का आदर होते देख कर कितने-क लोग सच्चे हीरा- सोतियों के अभाव सें, आदर-सत्कार पाने के लिए नकली हीरा- मोती पहनते हैं । नकली हीरा-मोती पहनने का उनका उद्देश्य सिर यही होता है कि नखरे करके किसी प्रकार लोगों को धोखा दिया जाय | इसी प्रकार संसार में श्रह्मचारी का आदर-सन्मान होते देखकर उसी प्रकार का आदर-सन्मान पाने की लालसा से कुछ लोग नाम मात्र के ऋह्मचारी बन बेठते हैं--व्रे ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते । ऐसे ब्रह्मचयं को शास्त्रकार লাল ऋअह्मचर्य कहते हैं । यह नाम त्ह्मचर्य की वात हुईं । जो स्वयं ब्रह्मचय का पालन नहीं कर सकता किन्तु ब्रह्मचर्य या ब्रह्मचारी की सूर्ति वताकर और उससे काम चल जावया-- ेसा सोचकर; मृति की स्थापना करके उसे मानता है वह्‌ स्थापना




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