श्रेष्ठ पौराणिक नारियां | Shreshtha Pauranik Nariyan

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Shreshtha Pauranik Nariyan by यादवेन्द्र शर्मा ' चन्द्र ' - Yadvendra Sharma 'Chandra'

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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“हूँ दीदी 1 दशरथनन्दन शम धनुष को क्यो नही तोडते | बैठे-बैठे देख रहै ह।“ उमिला ने तपाक से कदा, “देखने दो, हमारा इससे व्या वनता विगढता है ।” भत समझती क्यो नही । क्रितने सुकुमार ओर तेजस्वी है বান 171 “अब समझी, सुन दीदी, हमारे भाग्य मे जो वर लिखा है, वही मिलेगा | यह विधाता का लेख हैं। उसमें परिवर्तत की कोई सम्भावना नही ।” सोता ने उसे म्मभेदी दृष्टि देखा फिर वह मुसकरा पडी। एक-एक करके सारे राजा असफल हो गये । उनकी छूरता, साहम और अभिमान मिटता चला गया, साथ ही राजा जनक भी उदास होते गये । उहे लगा कि कही यह शिवघनुष नही टूटा तौ उनकी कन्या सीता क्या कुँवारी रहेगी ? वे पीडा से भर मपे) जवे सभो राजा निराश हो गये तब राम उठे । सीता के चेहरे पर शान्ति छा गयी 1 एक मुसकान दोड गयी । নিলা ने उपहास से कहा, “यदि दशरथनन्दन रास ने छनुय नही तोडा तो ?” सीता ने कहा, “अब शका की जगह वस्तुस्थिति को देखो । बाम उठ गये हैं। वे विश्वामित्रजी को प्रणाम कर रहे हैं। ” राम ने सबको प्रणाम किया और मन-ही मन शिव आराधना की! फिर वै शिवेधनुष की भौर वढे। एक वार उन्हाने उपस्थित लोगो को देखो । फिर शिवधनुष को सिर नवा कर देखते-देखते शिवधनुष के टुकड़े कर दिये 1) सोता गीर ठ्मिला प्रसन्नता के मारे उछल पड़ी ! उनकी सोता / १५




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