आज़ाद हिन्द फ़ौज | Azad Hind Fauj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भारतमें राष्ट्रीय सेना बिश्वविद्याठके ठा-रीडर श्री० के० भट्टाचार्यने पं० जवादरलाछ के एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि यह सेना जापानियों की देखरेखसे नहीं अपितु उस अस्थायी-घ्वाधोन भारत सरकार के तत्वावधानमे वनी थी जिसे संसारके जर्मनी, जापान शौर इटछी . छादि £ खतन्त्र राष्ट्रॉकी स्वीकृति प्राप्त थी । अत: स्पष्ट है कि यह सेना बिद्रोदी या विश्वासघाती नहीं अपितु शत्रु सेना स्वीकार की जानी चाहिये । गत महायुद्ध में चेकोस्टोवाकियाके नाग- रिकॉकी स्वतन्त्रता को मित्रराष्ट्रॉंनें स्वीकार किया था, यद्यपि उस समय भी चेकोश्टोवाकिया आछ़िण के अधीन था। उसी सिद्धान्त से इन मारतोय नागरिकों की स्त्राधीनता स्वीकार करनी होगी । कछकत्ता दाईकोर्टके एडवोकेट श्री जे० एन० घोष, एम0 ए० वी० एढ० ने “जन्तर/ष्ट्रंथ विधान आर आजाद हिन्द फोज” नासक विस्तृत ढेखमें अकाव्य प्रमाणोंसे यह /सिद्ध कर दिया कि इस सेनाके सेनिक विद्रोही नहीं अपितु युद्धरत-राष्ट्र के सेनिक हैं और उसी प्रकार का व्यवहार इन्हें मिठना उचित है । ब्रिरिशि के सदस्य मि० आर«० सोरेन्सेनने इस प्रश्न पर अपना मत देते हुए कद्दा कि * मेरी धारणा में ार्प्ट्यि सेनामें सम्मिठित होनेवाले नागरिकों को कित्टिंग ( नारवे्रे देशद्रोही का नाम) समकना मूठ है । जो इस सेना की नि ऊ




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