भारतीय काव्य शास्त्र की परम्परा | Bhartiya Kavya Shastra Ki Parmpra

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Bhartiya Kavya Shastra Ki Parmpra by डॉ. नगेन्द्र - Dr.Nagendra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भारतौय काव्य-दाह्त्र की परम्परा पहले हम रसो की व्याख्या करेंगे । रस के बिना किसी मी अर का प्रवर्तन नहीं होतां । विमाव झनुमाव घोर व्यभिचारो भाव इन तीनों के सपोग से रस निष्पत होता है। प्० इसमें उदाहरण कया हें उ० जैसे-कई प्रकार के व्यजन भोर भोपपि-द्रव्यो के सयोन से रस निप्पन्न हुमा बरता है बेसे ही नाना भावों के इकट्ठ होने पर रस निप्पन्न हो जाता है। जेते गुड भादि इव्यों व्यजनों मोर भौपधियों से छ रस बनते हैं इसी प्रकार स्थायी भाव नाना भावों से युक्त होवर रस बनते हैं। ऋषि कहूने लगे--रस क्या पदार्य है ? उ० भास्वाद भाना हो रस है । प्र० रस का भास्वाद कैसे भाता है ? उ० जैसे सहदय लोग सांति-मांति के व्यजनो से पके हुए भरत को साते हुए रसो का स्वाद प्राप्त करते हैं घौर प्रसन्न मी होते हैं वेंसे हो दर्शक लोग नाना भावों के धभितय नाटय से व्यजित तथा वाणी भग भोर सस्व से मिले हुए स्पायी भावों का झास्वाद प्राप्त करते हैं । इसलिए थे नाटय- रस हैं । पू० ७१ इस सम्दन्घ में परम्परा से माये हुए ये दो लोक हैं ।-- जैसे बहुत द्रव्यो भीर व्यजनों से मिले भन्न को खाते हुए लोग उसका भास्वाद लेते हैं वैसे हो पड़ितगण भावों के भभिनय नाटप से मिले हुए मावो का मन से भास्वाद लेते हैं इसलिए ये नाटघ-रस कहताते हें ६३९२-३३ 1 यहाँ प्रदन है कि--रसो से भाव बनते हैं या भावों से रस ? इसमें कई महानु- भावों का मत है कि भापस के सम्दन्घ से इनवी उत्पत्ति होती है। पर यह ठीक नहीं । बयी ? इसलिए कि--मावो से रसों की निप्पत्ति दीखती है रसो से मादो की नहीं 1 उसमें दलोक है-- क्योकि ये माँति-भाँति के भभितय वाले रसो को भावित करते हैं भरत ये भाव कहाते दें नाटप-प्रयोक्ताभो को यह जान रखना चाहिये। ३४। जैसे बहुत प्रकार के दब्यों से ब्यजन भभिव्यक्त होठा है इसी प्रकार भाव भी रसो को भभिन व्यक्त करते हैं । ३५ । रस मावहीन नहीं होता भाव रसहीन नहीं हुमा करता । अभिनय में उसकी परस्पर सिद्धि होती है। ३६ । ध्यजन भौर भौपधि का सयोग जैसे भप्त को सुस्वादु बना देता है दैसे भाव भौर रस मो एक दूसरे को भमिव्यक्त करने हैं 2 बज से दूर टोता है श्र दूस से होते हैं कैसे ही समी रता मूल होते--उनमें भाव व्यवस्थित होते हे । ३८ 1 भव इन रसो की उत्पत्ति रण देवता भौर उदाहरणों कौ व्यास्या करेंगे । उनदी उत्पत्ति के कारण चार रत हैं १ श्यगार २ रीद ३ वीर श वीमत्स 1 इसमें-शगार से हास्य होता है भोर रोद्र से कस्टा रस। बीर से भदुमुद रस उत्पन्न होता है भौर वीमत्स से भयानक । ३४ । श्गार का ही हास्य माता




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