राजस्थानी साहित्य संग्रह - भाग 2 | Rajasthani Sahitya-sangrah Bhag-ii

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Rajasthani Sahitya-sangrah Bhag-ii by जिन विजय मुनि - Jin Vijay Muni

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ११ ] क प्रतिके श्रतमें लिखे गये निम्न कवित्तादिसे भी बहादुरसहने चरिप्रकौ श्रनेक विशेषताएँ प्रकट होती ह- फवित्त- दुरजनसौं जीत, श्रसजनसीं नीत, गुरदयनत्तों श्रीत, ताहि सुजस दथानी का । धमनिवा साप्त अत्मनि গা मु दसि! ्राधिक्र पोच सावधानी) । सगरो मूर, दारिदशं दुर, सुभ गुयाओं पुर, मान मित्र श्रभिमानोका । हमप्रमभुप, बहादुर नरेस बली प्याब तेरा भ्रमौ ज्यों नवरो दूध पानीवो ॥ १ गेर मजबूतीहुआ रूप रापुतीहका थाटक संमुठ सन चाहम मुनीनक्रो । ল্নিকী কহযো বাণ रूपरो रिया भूप परतिय तजिया भ्रम पालक दुनतित्रो । थभ पावसाहीबो प्िपाहीको पिश्शनहार श्रमी मते काहू माकन सुनो तवो) हाय शवे ग्रुनहुताा छूट गो है दपा तर उट गो वहादुरेम गाहुक गुनीनको ॥ [২] গুল অল নাঈ গাখ। ভুসলনাী হার উহ অত অন দু জঙ্গী राजत निनेषफो ) খন নীল ঘা লন उधाप्यो पाप श्रवनीि, दुष्टनकों मार के उतारधां भार ससवा | भारी भाग बारे भूप चाहत है भोर जाह সাক্ষী पालक प्र नांसर कलसबा १ बाज मिद्ध मांहि जसे लीजिय गतप्त नाम जुदध काज भाम व्यौ बहादुर नरेसवा | १[३] गोते इड पानरो मेवास दिली श्रागरो म्वाहगा इडे आम रोकी गिग्गा विहु राहरो अतक। प्राटीपणों सोधादार सताराजधनू झ्राप दिंदुवामँ माटीपणों राजानरों हेक।॥ १ छंड पाच पाटा जगा पस दै द्रूटिया घनी झाछा भाड़ दस नेस लूटिया श्रनूप 1 कहे सेनापती मै पहादरेस कीघा बेई भू लाक भनमी भा वहादुरेस भूप ॥ २ सोपारा अग्राजा माहे सजिया न योट वितां मह'वचीर सार मांहे भगीया चमाय ।




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