शिवराज - विजय | Shivraj - Vijay

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Shivraj -  Vijay  by देव नारायण मिश्र - Dev Narayan Mishra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका ] [ १३ अग्रेजी कृतियो को सस्कृत में ख्पान्तरित कर उन्हें उपन्यास रीति में प्रस्तुत करने का श्रेय ए० श्ार० राजराजवमं कोइतम्बुरान को है। उन्होंने शेव्सपीयर के नाटक श्रोथेलो' का रूपान्तरण “'उद्दालचरितमू' नाम से किया है। उन्नीसवी शताब्दी मे ऐसे उपन्यासो की भी घना हुई, जो रामायण, महाभारत व पुराणों पर श्राघारित कहे जा सकते हैं । इनमें लक्ष्मण सुरि के रामायण सप्रह', 'भीष्मविजयमु' 'महाभारतसपग्राम' उपन्यासो मे कथाप्रवाह वर्णनातिरेक मे अवरुद्ध शा हो गया है । पौराणिक उपन्यासकारों मे शकरलाल माहेश्वर झगगणनीय हैं । उनके. “शनसुयाभ्युदमु' “भगवती भाग्योदय, 'चन्दप्रभाच रितमु व 'महेश्वरप्राणप्रिया' हृदयावजंक उपन्याप्त है । ऐतिहासिक घटनाझओ को इस युग मे उपन्थासबद्ध किया गया है । सामाजिक उपन्यासो की रचना इस युग मे हुई है । (ख) प० झम्विकादत व्यास का स्थित्तिकाल एव कृततियाँ साहित्याचार्य प० झ्रम्बरिकादत्त व्यास ने 'शिवराजविजय' नामक गद्य-काव्य की रचना की जो काशी से १६०१ ई० मे प्रकाशित हुमा । व्यास जी का स्थिति- काल १७५८-१९६०० ई० था । इनके पूर्वेज जयपुर राज्य के निवासी थे पर इनके पित्तामह काशी में ्राकर वस गये थे । वहीं उनका अध्ययन सम्पत्त हुमा । 'बिहारी-विहार' में उन्होंने 'सक्षिप्त निज वृतान्त' स्वय लिखा है । मृत्यु के समय वे गवर्नमेण्ट सस्झुत कालेज पटन। मे प्रोफेसर थे । बिह्दार मे 'सस्कृत सनजीवनी समाज” स्थापित कर उन्होने सस्कृत शिक्षा-प्रणावी का सुधार किया । व्यास जी ने छोटी बडी मिलाकर सस्कृत धर हिन्दी मे कुल ७८ पुस्तकें लिखी है । सस्कृत वाइमय, के प्रथम ऐतिहासिक उपन्यास का सौभाः्य शिवराज विजय' को प्राप्त है । जो अनुपम घाक्य-विन्यास एव झलकरण एव शब्दश्लेष की दृष्टि से कादम्बरी से प्रभावित---स्प शिल्प की दृष्टि से बग उपन्यासो के निकट है ।”” प० झम्बिकादत्त व्याप्त बाल्यकार्ल से ही प्रतिभाशाली थे। १० धर्ष की




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