हिंदी वक्रोक्तिजीवित | Hindi Vacroktijeevit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका | पु्व वृत्त है और कदाचित्‌ रुय्यक की भाँति श्रर्थालंकार माना. है । परन्तु यह वात नहीं है-- [पुतीय उद्योत में उसके सामान्य रूप की भी स्पष्ट स्वीकृति है जहां उन्होंने भामह की चक्रोक्तिविपयक इस प्रसिद्ध स्थापना की पुष्टि की है :-- सेपा सर्वत्र वक्रोक्तिरनया््यों विभाव्यते । यत्नोधस्यां कविना कार्य: बिना ॥। श्रौर वक्रोक्ति की पर्यायता स्वीकार करते हुए श्रानन्दवर्वन ने लिखा है: ना नर सबसे पहले तो सभी श्रलंकार अतिशयोक्ति-गर्भ हो सकते हैं। महाकवियों परा विरचित वह (अन्य अलंकारों की अतिदायोक्तिगर्मता) काव्य को श्रनिर्दरू-मेय प्रदान करती है । श्रपने विषय के अनुसार किया हुआ मत्तिदायोक्ति का. सम्व्न्ध योग) काव्य में उत्कर्ष क्यों नहीं लाएगा । भामह ने भी अतिदयोक्ति के लक्षण में ह कहा है:--(जो अमतिशवोक्ति पहले कह चुके हैं, सब अलंकारों की चमः कार-जननी) यह सब वही वक्रोक्ति है । इसके द्वारा परदार्थ चमक उठता है। कवियों गे इसमें विद्योप प्रयत्त करना चाहिए । इसके थिना अलंकार ही क्या है ? उसमें कवि की प्रतिभावद अतिवायोक्ति जिस अलंकार को प्रभावित करती, है; सको (ही) दोभातिशय प्राप्त होता है । श्रन्य तो (चमत्कारातिदाय-रहित) श्रलंकार 1 रह जाते हूं । इसी से सभी अलंकारों का रूप धारण कर सकनें को क्षमता के गरण. श्रमेदोपचार से वही सर्वालंकाररूप है, यही अर्थ समझना चाहिए ।”--(हिन्दी बन्यालोक पृ० ३६-९५) उपर्युक्त विवेचन का निष्कर्ष यह है कि आनन्दवर्वन के मत से (१) चक़ोक्ति श्रतिशयोक्ति की पर्याय एवं सर्वालंकाररूपा है, (२) उसका चमत्कार कवि-प्रतिभाजन्य है, (३) विपय का मौचित्य उत्तका नियामक है अर्थात्‌ चक्रता श्रयवा अतिदाय का 'प्रोग विपय के अनु हूल ही होना चाहिए । गा मर इस तीसरे दाथ्य के द्वारा आनन्दवर्धन ने वढ्रोक्ति को श्रपने सिद्धान्त के अन- सन में ले लिया है । प्रत्यक्ष रुप में श्रानन्दवर्वन के ग्रन्य में वक़ो क्ति की इतनी ही चर्चा हूं; आर ' हु भी अत्तिशयोक्ति के द्वारा । किन्तु अप्रत्यक्ष रुप में उनके ध्वनि-निरुपण का कुक वक्रोक्ति-विवेचन पर गहरा श्रौर व्यापक प्रभाव है । चक़क्ति-जीवितम की रूपरेखा .




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