श्री दिवाकर अभनन्दन ग्रन्थ | Shari Divakar Abhinandan Granth

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पं. शोभाचंद्र जी भारिल्ल - Pt. Shobha Chandra JI Bharilla

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मोहनलाल जी उपाध्याय निर्मोही - Mohan Lal Ji Upadhyay Nirmohi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका ! आप लोगों के द्वाथों में पहुँच रहा है | अंथ में जहां तक हो सका विपयान्तर वहीं आने दिया गया है तथा तारत्तम्थ की रक्षा की गई है। साहित्य, समाज, दशन, जीवन, पथखंड एवें संदेशादे विश्ागों में इस प्रथ के लेखों को विभक्त किया गया है। इस श्रथ के लेखों के सम्बन्ध में में लेखक मद्दातुभावों का हृदय से आभारी हूँ, जिन्होंने भ्पने वश्मूत्य लेख जर्प समय में ही हमें भेज देने की कृपा की है । यह सब उन्त कपालु लेखक महासुभावों की सदभावत्ता का ही फल है कि সয় আজ হুল रूप में श्री जन दिवाकरजी के भक्तो पव जेन सरति तथा इतिहास के प्रेमियों के समक्ष पहुँच रहा है! इस अवसर पर में श्री जेन दिवाकरजी कै सुरिष्य परम आाद्रणीय उपाध्याय साहिदरल पं० मुनि श्री प्यारचंदजी महाराज को नहीं भूल रूक्ता, जिन्‍्होने प्रंथ तेयार करने सम्बन्धी मेरे प्रस्ताव को क्रियात्मक रूप देने में अपनी योग्यता, धुद्धि- मत्ता परव भ्रगाद्‌ पाडित्य का पूरा पूरा परिचय दिया । उपाभ्यायजी शरी ष्यास्चदजी महाराज स्वयं थनेक খত শী ঈদ সালা है एवं दिवाकरजी के अन्यतम शिप्यों में से हैं। प्रपे गुरुके यशः सोरम से दिगिगन्त को उद्भास्त करना आपका प्रथम च्य रहता है। यह अथ-रत्त द्वी उनकी प्रेरणा, सूभ, जागृत-बुद्धि एवं सतत्‌ कार्यशील व्यक्तित्व का परिचायक है। इसकी सफलता का श्रेय सचमुच्च उपाध्या- यज्ञी महाराज ही को है। अंत में मैं अपने सभी सहयोगियो, विद्वानों एवं लेखकों को धन्यवाद देना अपना कर्तव्य समझता हैं जिन्होने मुझे समय समय पर अपनो बहुमूल्य सममतियों से ज्ञाभास्वित कर इस गुरुतर कार्य को संपूर्ण करदेने में सहयोग प्रदात्त किया है। ज्िस मह्ाएरुप के कर कमलो मे यह प्रेथ-रक्ष श्रपिंत किया गया है লক व्यक्तित्व विशाल, पांडित्य गहन एवें प्रतिभा श्रोजस्विनी है । ऐसे महापुरुष झृप्ण की गीता के वाक्य “यदा यदा हि धर्मस्थ” के अनुरूप ही जन्‍म लेकर लोक कल्याण करते है । आज के संघस्त मानव एवं पीड़ित भानवत्ता का कल्याण ही इसमें है कि ऐसे युग पुरुषों द्वारा प्रसारित सदुपदेशों के মান का अधलस्बन करें, तथा उनके संदेशों से समस्त संसार में शांति एच कल्याण की भावना का प्रचार करें। आज़का भयाकुछ, परवद्, संच्रस्त संसार खतंत्र एवं सुखी हो । सैऽत पवधिनः सन्तु सर्वे सन्‍्तु विशामयाः । ते मद्रास पनु करन्‌ टुत मामवाद ॥ সি




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