हिन्दी जैन साहित्य परिशीलन | Hindi Jain Sahitya Parishilan

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : हिन्दी जैन साहित्य परिशीलन - Hindi Jain Sahitya Parishilan

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about डॉ. नेमिचन्द्र शास्त्री - Dr. Nemichandra Shastri

Add Infomation About. Dr. Nemichandra Shastri

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
धर्तसान काव्यधारा ओर उसकी विशिन्न प्रवृत्तियाँ २१ अहो अलंकार विहाय रत्न कें, अनूप रत्नन्नय भूपितास हो। तते इए अस्वर अंग-अंग सें, दिगम्वराकार विर श्रून्यरद्धो॥ समीप হী জী দহ ভুত ই, नितान्त इवेतास्वर गा बना रहा। अम्नध निर्देन्द. शहान হী, না এবি 8: (न जब के ध्वजा ॥ वस्तु वर्मन महकाब्यका दंफि घणना-विधान, ध्यरोजना और परिस्थिति निम्माण--- হন আন 2 | জভ্ত জাননা জবানস্তুজ प्राय. हन्य-बाजना तत्वका अभाव व 1 घथ्नादधान ओर परिस्थिति निर्माण इन दोनो तस्वाकी वहुलता है। कदिने इस प्रकाग्का काद दच्च जायो- जित नही किया है जो मानवची गगात्मिका हतत्त्रीकों सहज रूपम झझत कर सके । घठनाओका দল मन्थर गतिसे बढ़ता हुआ आग चलता है सिससे फ्ठवक्ते सामने घटनाका चित्र एक निश्चित ऋमके अनुसार ही प्न्तुत त्ता टे ! महाकाव्यवी आविवारिक कथाबन्तुके साथ ग्रासांगक कथावस्तुक रहना भी महाकाब्यली गन्त्ताकै र्षि आव्व्यक अग ६। प्रासागक कया मृकथामे तीता उत्पन्न करती ह | वद्धमान काब्यमें अवान्तर कथा स्पस्न चन्दनावरित, छामदेवसुरेन्द्र- सवाद तथा कामदेव-द्वारा चद्धमानकों परीक्षा ऐसो ममरपणी झवान्तर कथाएँ ६, जिनसे जीव्मके आनन्द ओर सान्ठ्यका आभास হী নর্তা শীজা प्रत्युत सोन्दर्यका জালাবসাহ ছানি কাকা ह | जगत्‌ यार जीवनक्रै अनेक सपों और व्यापारोपर, कविने अप्नी विभूतिको चमत्कारपर्ण ढगसे आविर्भत ৮




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now