अध्यात्म - प्रवचन | Adhyatam Pravchan

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अमर मुनि - Amar Muni

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विजयमुनि - Vijaymuni

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ग्रध्यात्म-जीवन ७ इृष्टिगोचर होती है । यह मानव की आध्यात्मिक निर्धनता की स्थिति है। आत्मोद्धार के स्रोत से वियुक्त, सत्य के ज्ञान से अनभिज्ञ, आज का मानव्र धीरे-धीरे विकास से विनाश की मोर अग्रसर हो रहा है, उत्यान से पतन की ओर बढ रहा है। मेरे विचार मे आज के वैज्ञा- निक युग की वह समृद्धि व्यर्थ है, जो मनुष्य की आध्यात्मिक क्षधा को वप्त नही कर सकती । वे आविष्कार त्याज्य हैं, जो मनुष्य को मनुप्य नहीं बना रहने देते । भोगवादी हष्टिकोण ने मनुष्य-जीवन मे निरागा, अतृप्ति गौर कूठा को जन्म दे डाला है । दूसरे शब्दो मे निराला, अतृप्ति और कु ठा ने आज की जन-चेतना को जकड लिया है । शक्ति, अधिकार तथा स्वत की लालसा दिनो-दिन प्रचण्ड एव वीभत्स रूप धारण करती जा रही है। इस दृष्टि से मैं यह सोचता हूँ कि मनुष्य को पतन के इस गहन गतें से निकालने के लिए, आज प्रगतिगील एव सुजनात्मक अध्यात्मवाद की नितान्त आवश्यकता हैं। आज का मानव परस्पर के प्रतिगोघ गौर विदेष के दावानल मे भुलस रहा दै । आज के मानवको वही धर्म एव दर्शन सुख और सन्तोष दे सकता है, जो आत्म-बोध, आत्म-सत्य एवं आत्म-ज्ञान की उपज है। वही अध्यात्म- वाद आज की इस घरती पर पनय सकता है, जो विश्व की समग्र आत्माओ को समान भाव से देखने की क्षमता रखता है। अध्यात्मवाद कही वाहर से आने वाला नहीं है, वह तो हमारी आत्मा का धर्म है, हमारी चेतना का धर्म है एवं हमारी सस्क्ृति का प्राणभूत तत्त्व है । आज के मनुष्य को यह समझ लेना चाहिए कि उसे जो कुछ भी पाना है, वह कही बाहर नहीं है, वह स्वय उसके अन्दर मे स्थित दै) आवद्यकता है केवल अपनी अव्यात्म-गक्ति पर विश्वास करने की, विचार करने की और उसे जीवन की धरती पर उतारने की! जहाँ तक मैंने अध्ययन और मनन किया है, में यह कह सकता हूँ, कि प्रत्येक पथ और सम्प्रदाय का अयना कोई विश्वास होता है, अपना कोई विचार होता है और अपना कोई आचार होता है। आचार वनता है--विचार से और विचार वनता हे--विश्वास से । विव्वास, विचार (ज्ञान) और आचार कही वाहर से नहो आते। वे आत्मा के अपने आत्मभूत निज गरुग है। आत्मा के इन निज गुणों का जोधन, प्रकायन सौर विकास ही वरुठुत हमारी अव्यात्म-सावना है । अध्यात्म-साधना का इतना হী অন ই, কি वह मनुष्य की प्रमुष्त शक्ति को प्रबुद्ध कर देती है। विश्व में जब साधक अनेक हूँ, नो साधना की ८




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