श्रेष्ठ बौद्ध कहानियाँ | Shreshth Bauddh Kahaniyan

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Shreshth Bauddh Kahaniyan  by श्री व्यथित हृदय - Shri Vyathit Hridy

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बुद्ध का प्रभाव 13 खबर दी कि चुद्ध भगवान्‌ यहां आ गये हैं। ब्राह्मणों के आम्रवन में ठहरे हुए है। संगारव पहले से ही तैयार था! उसे अपने उदेभट ज्ञान पर अभिमान था। वह बुद्ध भगवान्‌ के आगमन का हाल सुनकर उनके पास गया और उन्हें आदर से प्रणाम कर एक ओर बैठ गया। संगारक कुछ देर तक चुप रहा- रहस्य-भरी दृष्टि से बुद्ध कौ ओर देखताः रहा। इसके बाद उसने जिज्ञासु के रूप में कहा--'गौतम! बहुत से श्रमण- ब्गद्मण शुद्ध ब्रद्मचारी होने का दावा पेश करते हैं, क्या आप उममें है ?' ४ हां भारद्वाज! मैं तो उन्हीं आदि ब्रह्मचारियों में हूं। मुझे ज्ञान प्राप्त होने के पहल ऐसा आभास हुआ कि गृह-बास जंजाल है, संसार के विग्रहों का मूल है। मनुष्य संन्यास के सुविस्तृत मैदान ही में जीवन के वास्तविक सुखों को प्राप्त कर सकता है। संन्यास शंख की भांति उज्ज्वल, मोती जेसा चमकदार और सत्य की भांति सुन्दर है। में अपने इसी आभास-आधार पर जवानी ही में अपने माता- पिता को रोता-कलपता छोड़ गृह से अलग हो गया। उस समय मेरे शरीर पर राजसी वस्त्र थे, सिर पर काले-काले घुंघराले बाल थे। पर उन बस्त्रों को छोडने और उन बालों को काटने में मुझे অলিক শী ममता नहीं हुई। भारद्वाज! यह मब सनन्‍्यास्त-प्रवृत्ति की ही तो प्रभुता थी! / संन्‍्वासी हो में शांति और चिरंतन सुख की खोज में संसार में निकला। सौभाग्य से आलार कालाम के पास जा पहुंचा। मैंने उससे कहा- श्रेष्ठ! में धर्म में ब्रह्मचर्य-वास करना चाहता हूं। बस, रात के तीसरे पहर तम हटा, आलोक उत्पन्न हुआ। ज्ञान की सुनहली किरणों ने, अज्ञानता के काले पर्दे को फाड़कर मेरे हृदय को नगमगा दिया। '' संगारव बुद्ध भगवान्‌ को बातों को सुनकर चकित-सा हो गया} उसके हृदय पर इन बातों का ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह थोड़ी देर तक मन्रमुग्ध की तरह बुद्ध की आकृति की ओर देखता ही रह गया। जब उसका ध्यान भंग हुआ, तब उसने कहा-- गौतम | आप धन्य हैं। में भूला हुआ था। मुझ भूले हुए को अब अपनी शरण में लीजिये।!”' संगारव ने “में भिश्षु संघ के प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा प्रकट करता हू कहकर गौतम के सामने अपना मस्तक झुका दिया। क्‍यों न हो, सत्य और धर्म की सर्वत्र विजय होती है।




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