धर्मयुद्ध | Dharmyuddh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्‌ पमयुद्ध | १५ भाजी ने बेटी के सिर पर हाथ रख कर, अपनी कसम दिल्ला कर पूछा--- “बोलती क्यों नहीं,' “ क्या बात है १ ! तब विद्या ने रा-रों कर बताया--“बताऊँ क्या १ मुभ पर दी बीतेगी ' * उन्हे नीचे बेठा कर शराब पिज्ञा रहे हैं| जाने कोन दो रहं आयी हुई हैं ! मैया बडे आदमी हैं, चाहे जो करें। मै तो कहीं की न रहूँगी। ` इन्द लत लग गतो मुभ पर क्या बीतेगी १”? লাজী के मस्तिष्क में अपने परिवार के सबनाश की आशंका और भय॑फर पाप के पति क्रोध की खचिनगारिया की आतिशत्राजी सी छूट गयी | जिस झबत्था मे बंठी थी--पके उल्लके खुले बाल, पुरुष की दृष्टि के प्रति निःशंक्त शिधि्न खुज्ञे शरीर पर बेपरवाही मे डल्ला हृश्रा घधोती का आचल --वंसे दी जीना उतरते समय धोती को पाव में उत्नक जाने से बचाने के लिए তন্বীজলা में घुटनों ते भी ऊपर उठाये वे नीचे की मंजिल में आ पहुँचीं । पक्का देकर उन्होने बेठक के किवाढ़ खोल दिये | बिजल्ली के प्रकाश में उन्होंने जो कुछ देखा उससे वे क्रोध मे ब्रदहवास हो गयी | जेते अपनी सनन्‍्तान को भेड़िये के मंह मे जाते देख गंया क्रोध श्र तृस्ताहस में अपने सामथ्यं के ओचित्य की चिन्ता न कर शैर के मुह में अपने निबल सींग श्रड़ा दे | ५, ० ক नीचे बंठे लोग अपने हँसी मजाक के ठह्ठाके में मा जी के जीना उतरने की आहट न पा सके थे । के० क्ाक्ष रंग में आकर साथुर की साक्ती को अपना पेग खत्म करने में सहायता देने के लिए. उनका भिल्ला उठा कर उसके मुख से लगाये भे | मिसेज माथुर के० लाल को संतुष्ट करने के लिए मुस्फराती हुई अभ्रयने ग्रिज्लास में बोतत्ञ से नया पेग डाल रही थीं । उसी समय भयंकर चीत्कार का शब्द सुन सब की दृष्टि दरवाजे की शरोर रायी शरोर देलामौंजी को, केश बिललरे, श्रधं नग्न शरीर । उनकी श्रौषं दिनके प्रकाश मे जलते बिजल्ली की थर्च के बल्मो की तरह निक्तेज होकर भी चमक रही थी । अपनी ढीली धोती के खिसक जाने की भी परवाह न कर सा जी दोनो हाथ अ्रांगे बढ़ा कर चिल्ला उठीं--/सत्य|नाश हो तुम शर्डों का [तुम्हारा कोई न रहे [ “'”''दूसरों का घर उजाड़ रही हा | 'अपनों को क्लेकर मरा |?!




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