यामा | Yama

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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है। वह एक संसार में रहता हूँ और उसने अपने भीतर एक और इस संसार से अधिक सुन्दर, अधिक सुकुमार संसार वसा रखा है। मनुष्य में जड़ और चेतन दोनों एक श्रगाढ़ जालिद्धन में आवद्ध रहते हैं। उसका वाह्मयाकार पार्थिव और सीमित संसार का भाग हैं और अन्तस्तल अपार्थिव असीम का--एक उसको विश्व से बाँध रखता हूँ तो दूसरा उसे कल्पना-द्वारा उड़ाता ही रहना चाहता हैं। जड़ चेतन के बिना विकासशून्य हूँ और चेतन जड़ के बिना आकारशून्य। इन दोनों की क्रिया और प्रतिक्रिया ही जीवन हैँ। चाहे कविता किसी भाषा में हो चाहे किसी वाद के अन्तगंत, चाहे उसमें पार्थिव विश्व की अभिव्यवित हो चाहे अपार्थिव की और चाहे दोनों के अविच्छिन्न सम्बन्ध की, उसके अमूल्य होने का रहस्य यही हैँ कि वह मनुप्य के हृदय से प्रवाहित हुई हैं। कितनी ही भिन्न परिस्थितियों में होने पर भी हम हृदय से एक ही हूं यही कारण हूँ कि दो मनृष्यों के देश, काल, समाज आदि में समुद्र के तटों जसा अन्तर होने पर भी वे एक दूसरे के हृदयगत भावों को समभलने में समर्थ हो सकते हं। जीवन की एकता का यह छिपा हुआ सूत्र ही कविता का प्राण हूँ । जिस प्रकार वीणा के तारों के भिन्न भिन्न स्वरों में एक प्रकार की एकता होती हैं जो उन्हें एक साथ मिलकर चलने की और अपने साम्य से संगीत की सृष्टि करने की क्षमता देती हैँ उसी प्रकार मनुष्य के हृदयो में एकता चिप हुई हैं। यदि ऐसा न होता तो विश्व का संगीत ही वेसुरा हौ जाता) फिर भी न जाने क्यों हम लोग अलग अलग छोटे छोटे दायरे वना कर उन्हीं में बैठे वैठे सोचा करते हैँ कि दूसरा हमारी पहुँच से बाहर हैं। एक कवि विश्व का या मानव का वाह्म-सौंद्यं देखकर सब कुछ भूल जाता है, सोचता है उसके हृदय से निकला हुआ स्वर अलग एक संगीत की सृष्टि करेगा; दूसरा विश्व की आन्तरिक वेदनावहुल-सुपमा पर मतवाला हो उठता है, सममता है उसके हृदय से निकला हुआ स्वर सबसे अलग एक निराले संगीत की सृष्टि कर छेगा परन्तु वे नहीं सोचते कि उन दोनों के स्वर मिलकर ही विश्व-सद्भीत की सृष्टि कर रहे है । वत्त मान, आकाश से गिरी हुई सम्बन्धरहित वस्तु न होकर भूतकाल काही वालक ' है जिसके जन्म का रहस्य भूतकाल में ही ढूंढ़ा जा सकता है। हमारे 'छायावाद के जन्म का | रहस्य भी ऐसा ही हैं। मनुप्य का जीवन चक्र की तरह घूमता रहता है। स्वच्छन्द घूमते घमते थककर वह अपने लिए सहस्र वन्धनों का आविष्कार कर डालता है और फिर बन्धनों से ऊबकर उनको तोडने मं अपनी सारी शपितयां लगा देता ह्‌ । । छायावाद के जन्म का मूलकारण भी मनुप्य के इसी स्वभाव में छिपा हुआ ह। उसके जन्म से प्रथम कविता के वन्धन सीमा तक पहुँच चुके थे और सृप्टि के वाह्याकार पर इतना अधिक लिखा जा चका था कि मनृप्य का हृदय अपनी अभिव्यक्ति के लिए रो उठा। स्वच्छन्द छन्द में चित्रित उन मानव-अनुभूतियों का नाम छाया उपयुक्त ही था ओर मुकं तौ आज भी उपयुक्त ही गता ह्‌ 1 | ग्यारह्‌ __.




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