ऋग्वेद संहिता | Rigwed Sanhita

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
9 MB
कुल पष्ठ :
276
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)४ अ०, ५ म0, १ अध्या०, १ अनु>?) सटीक ऋग्वेद-सहिता ५१९ सुत्तश्रन्नि देवता | अत्रिके अपत्य सुतम्भर ऋषि | जयती छत्द |जनस्य गोपा अ्रजनिष्ट जाशविरगिनिः सुदक्षः सुविताय नव्यसे |
घृतप्रतीको बृहता दिविस्पशा द्यमह्िभाति भरतेभ्यः शुचिः ॥१॥
यज्ञस्थ केतु प्रथमं पुरोहितमग्नि नरस्त्रिषघस्थे समोधिरे ।इन्द्र ण॒ देवेः सरथं स बहिंषि सीदन्नि होता यजथाय सुक्रनः ॥२॥
असमृष्टो जायसे मात्रोः शुचिम न्द्रः कविरुद्तिष्ठो विवस्वतः ।
पतेन स्वारथयन्नम्न ब्राहूतधूमस्त केनुरभवदिविश्रितः ॥३॥
अग्निना यक्ञमुपवतु साधुयराग्नि नरा विभरन्ते रेष ।
अग्निदृतो श्रभवद्धव्यवाहनोग्नि इणाना वृणत कविक्रनुम ॥४॥१ लोगोंके रक्षक, सदा प्रबुद्ध ओर सबके द्वारा स्छाप्रनीय बलवाले अश्नि छोगोंके नूतन कत्याणके
लिये उत्पन्न हुए हैं | घृत द्वारा प्रज्वलित दोनेपर तेजोयुक्त और शुद्ध अश्नि ऋत्विकोंक लिये य॒ निमान्
होकर प्रकाशित होते हैें।२ अश्नि यज्ञके केतुस्वरूप हैं अर्थात् प्रज्ञापक हैं। अश्नि यजमानों द्वारा पुरस्क्तत होते हे- पुरो
आगमे स्थापित होते हें । अग्नि इन्द्रादि देवोंके समकक्ष है | ऋत्विकोने तीन स्थानोमें अग्निकों समिद्ध
किया था। शोभनकर्मा और देवोंके आह्वानकारी अश्नवि उस कुशयुक्त स्थानपर यक्षके लिये प्रतिप्ठित
दूष भे)३ हे अश्म, तुम जननी स्वरूप अरणिद्धयसे, निविघ्च होकर, जन्म ग्रहण करते हां। तुम पवित्र,
कवि ओर मधावी हो । तुम यजमानोंसे उदित होते हो । पू महपि्यानि घन द्वारा तुम्द बद्धित किया
था । हे हव्यवाहक, तुम्हारा अन्नरिक्षन्यापी धूम केतुस्वरूप ह-तुम्टागा प्रज्ञापक या अनुमापरक ই ।७ सब पुरुषार्थोके साधक अभ्नि हमार यज्ञम अगामन कों। मनुप्य प्रतिगृहमें अश्नि-संस्थापन
करत हैः । हव्यवाहक अच्चि दैवोके दूत-स्वरूप टै । यक्ञसम्पादक कहकर लोक अश्विका सम्भजनकरते हैं |
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