विवेक के रंग | Vivek Ke Rang

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पर साहित्यके गहरे आध्रह थे। मादयोगको ज्ञानणेग और कर्मग्रोगके मथा मानना, प्रकृति-चित्रणका गहरा आग्रह, आदिम रूप-ब्यापारों ; उद्घाटनपर जोर, कवि-कर्ंका महत्व आदि उतके काव्य-लिद्धान्त ीयें स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्तियोसे परिचालित थे । यह संयोग मात्र नहीं है के भारतीय काज्य-विन्तन-परम्परामें 'कल्पना' ( जो कि स्वच्छन्दतावाद> ही प्रेरक शवित भातो जाती है ) पर शुक्जों पहले व्यवित है जिन्दोने _मकर, विचार, किया है। रीतिकालको तमाम रूढ़ियोके विरोध और प्रवमूल्यनमें शुक्ल॒जी प्रसाद, पन्‍्त और निद्यछाके साथ थे । जिस “मक्ति- हाल को शुक्दमणी इतना महत्त्व देते है उसीसे तमाम छायावादी कवि भों अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं। थद्दांतक कि रोतिकालके फुटकर खातेके भीतर रखे गये घनानन्दकों जिन कारणोसे वे अतिशय प्रशंसा करते है थे कारण छटायावादो काग्य-तेलके दै। सं नामवर वहने शुव्ररजोके साहित्य. सिद्धान्तोंकी रोमैण्टिक आधारमूमिकों काफ़ी स्पष्ट किया है) शुक्लजलोके वारे एक भ्रम है फिवे छायावादके निन्दक ये) वस्तुतः थे छामावादकी कृत्रिम रहस्यवादिता एवं कुष्ठाओंके निन्‍्दक थे। कहना चाहूँगा कि छायावादी कवियोंक्री जो आलोचना उन्होंने अपने इतिद्वासमें की है वह आज मो अव्यर्थ है। थों किसो भो कवि या काब्यान्दोहनकों समस्त व्वप्र ও আব লেনে তু হন खो एफ टुः स्वकर क नहीं करता । उसका उद्घाटन हर युग अपने अनुकूल करता रहता है जैसे कि मुक्तिवोधने जब 'कामायनी' पर पूर्वावचार करते हुए उसका विश्केषण फ्रेप्देघो प्रानकऊर किया तो वस्तुतः उन्होंने छस महनोय कृविको अपने सूननके लिए प्रशृंगानुकूल बताया! था \ यों दुक्नजोके जो यायित नैतिक आग्रह थे वे भो ह्शामो देमानन्द सरस्वती और महात्मा गान्मोके




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