महादेवभाआई की डायरी भाग - ३ | Mahadev Bhai Ki Dayeri Vol Iii

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Mahadev Bhai Ki Dayeri Vol Iii by नरहरि द्वा. परीख - Narahari Dwa. Parikhरामनारायण चौधरी - Ramanarayan Chaudhari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पहली अगस्तके दिन तमाम आश्रमवासियोंने आजम छोड़ दिया। जिसमें आश्रम- वासियोंका अेके प्रकारका त्याग तो था ही, पर गांधीजीका तो वह महावल्ति-. . दान ही था। कारण आश्रम -गांधीजीके जीमें आये वैसें विविव प्रकारके प्रयोग करनेकी ओक प्रयोगशाला थी। अपने अंचेसे अंचे आदर्शोकी साधना गांधीजी आश्रमके द्वारा करते थे।- आश्रमके द्वारा अपने आध्यात्मिक “कम्यनिज्म ' का प्रयोग कर दिखाकर देशके या: संसारके चरणोंमें भेंट करनेकी अनकी महत्त्वा- कांक्षा थी। पर- अँसे आश्रमवासी कहां थे, जो अनके आदशोको अपना सकें “ और जीवनमें व्यक्त करें सकें? ओक विनोवा और जैसे दो-चार और होंगे, पर बाकीके सबमें तो यह ताकत थी ही - नहीं। -कुछ आश्रमवासियोंके पतनके और आश्रममें पैदा हुओ दलबन्दीके समाचारोंसे वांपू कुंछ समयसे आश्रमके वारेमें: बेचेन तो - रहते ही थे। सरदारने तो बातों ही वातोंमों कह भी दिया था कि “आश्रम वहुत बड़ा हो गया है। असमें कुछ वेकार लोग जाघूसेहं। अन्दं निकार दीजिये। चल्नीमें भूसा तो वार-वार उक्ता रहा ह! ओक वार छानकर भूसेको अलग हीः कर दीजिये” गांधीजीने भी यह्‌ वात स्वीकार कौ थी। ये सारे प्रसंग अनके मन पर अपना काम अनजाने भी कर तो रहे ही होंगे।- आश्रमके विसर्जनके -लिओ . निमित्त तो वना व्यक्तिगत सविनयभंग, पर अन्हें मालूम न पड़ते हुओ भीतर ही भीतर आश्रमके- विसर्जनके निर्णयमें ये सब बातें भी मदद दे रही हों तो कोओ ` आश्चय नहीं। \ | ३१ जूलाओकी रातको गिरफ्तारीके बाद गांधीजी और महादेवभाजीको सावरमती जेलमें और वहांसे यरवदा जेलमें ले जाया गया। यरवदा जेलमें आते ही मालूम' हुआ कि आनके दो पुराने साथियोंमें से सरदारको ऑपरेशनके लिओ वम्बओ ले गये हँ मौर छगनलारू जोशीको सेपरेटमे रखा है। वादमें जव पता चला कि सरदारंका ऑपरेशन हुआ ही नहीं और अन्हें सीवे नासिक ले गये हैं, तब गांधीजी . पर जिसका बहुत असर हुआ और अन्होंने ये अद्गार प्रगट किये: “मिस तरह जिन लोगोंने बललभभाजीकों भी धोखा ही दिया न? वे बेचारे. तो यही मानते थे कि ऑपरेशनके लिओ ले जा रहे हँ। कैसी नीचता है? ” “यह घाव ` जल्दी भरनेवाला नहीं. हं । “ वल्लभभाजीका जिस तरह अलग किया जाना अन्दं वहुत चूभता था। ओौर छुटपनमें भर्तृहरि नाटक देखा था; असकी अक पंक्ति अं रे जंखम जोगे नहीं मटे“कोवे वार-वोर याद करते थे। ४ अगस्तको सवेरे छोड़कर नोटिस देने और असको भंग करने पर फिर पकड़ लेनेंके बाद यरवदा जेलमें। लाकर 'मुकदमा चलानेका नाटक রর মাঃ হাসি




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