सत्य - जीवन | Satya - Jivan
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
145
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१५१
सत्य जीवन ( £
यात्री ने भी मुख सोड़ा और अपने सम्बन्धी के मकान पर
आवाज लगायी। सम्बन्धी बाहर निकला) दोनों नमस्ते एक
इूसरे को कह कर घर के भीतर चले गये ।
सम्बन्धी: भाई. कहां से आ रहे हो ?
यात्री:--जहाँ रहता हूँ वहीं से भ्रा रहा हूँ ।
भम्बन्धी:-- कहो, कंसे झरना हुआ ?
यात्री. पंदल ही भ्रा रहा हूँ। मार्ग में अद्भुत मूखेता का
देखता आया हूँ । हर एक मनृष्य अपने विचारों में मस्त हैं 1 कोई
किसी की वात सुनना ही नहीं चाहता, चाहे वह वात कितनी ही
सत्य तथा न्यायसंगत हर । |
सम्बन्धी: तुम्हारा पागलपन अभी चल ही रहा है ।
यात्री. और चलता ही रहेगा जब तक क्रि में सत्य की खोज न
करल् ।
सम्बन्धी: श्रच्छा, थक गये होगे, अव तनिक आराम करा। कल
सत्य नारायण की कथा है। पूर्णमासी का दिन है। उसके
. लिये
म सामान लेकर अ्रभी आता हूँ ।
( सत्य नारायण कौ कथाः एक पुस्तक है जिस में सत्य
भाषण और सत्याचरण का महत्व वर्णन किया गया
वास्तविक सत्य नारायण की कथा का वर्णन न हीं है। )
यात्री पलंग पर लेट गया और सोचने लगा, प्रहा 1 `वा
है। उसमें
अच्छा अवसर मिला, सत्य नारायण की कथा | श्रवतो सचमुच
पत्य का साक्षत्कार हो जायगा। इतना सोच ही रहा था कि
सम्त्न्धी सामान लेकर वापिस झा गया। भो
निवृत्त होकर फिर वार्तालाप आरम्भ हुआ ।
यात्री: भाई कथा कौन कहेगा ?
सम्तन्धी: -- एक बड़े पन्डित आये हुये हैं । मैंने एक संकल्प किया
जन इत्यादि से
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