उपादान और निमित्त्की शास्त्रीय चर्चा | Upadan Aur Nimittki Shastriya Charcha
श्रेणी : जैन धर्म / Jain Dharm

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
91
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)तभी तो गोम्भटप्तार कर्म काण्डमें केवछ नियाति या स्वभाव
अथवा आत्माका कोरा कथन करना आदि मन्तन्य ३६१
मिथ्यामतोमिं गिनाये हैं |
^ जन्तु जदा जेण जहा जस्स य णियमेंण होदि तत्तु तदा ।
तेण तहा तस्स इवे इदि वादो णियदिवादो दु ॥ ”( गोम्मटसार )जो, जिष समय, जिससे, जे, जिसके नियमसे होता ই
वष्ठ, उप्त सपय, उप्ते, तैसे उवे ष्टी होता है। यह नियति
नामका ।मध्यत्व € |^ को फरई कटयाणं तिक्खत्तं पियविहंगमादीणं, ।
विविहत्तं त॒ सदहाओ इदि सब्व॑पि य रदाओत्ति ॥”( गोम्मटसार )
कार्टामें तीए्पपना कोन करता है १ पृण, पक्षी भारिक
न्याहे न््यारे स्वमाबोंकों कोन बनाता है ! इस्त प्रश्नका उत्तर यही
है कि सब स्वमावसे काय बन जाते हैँ । ये सब स्व॒माववाद
मिथ्यादशन हे । इप्ती प्रकार मात्र आत्माके गीत गाना भी गास.
वाद नामका मिध्यादर्शन है। |
(जो नैता होनहार है, चैते कारण मिक जयगे, छीर कार्यतदनुप्ार् बन बैठेगा, ऐसे कथनमें कोई प्लार नहीं दे (जो होन-
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