प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ | Pragatisheel Sahitya Ki Samasyayen

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Pragatisheel Sahitya Ki Samasyayen by रामविलास शर्मा - Ramvilas Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ४ ] निवा स्वयं व्यक्तिगत या सामाजिक रूप से इन घटनाओं या भावनाओं से अपने को निर्लिप्त और निस्संग [हीं रख सकतः ; अतः जो उसे महत्वपूर्ण लगता है वही स्थायी श्रौर सुन्दर भी लग सकता है ।” अगर महान लेखक निःसंग और निर्लिप्त नहीं होता, वह वर्ग संघर्ष से तरस्य न रह कर शोषण व्यवस्था का विरोध कसता है, तो उसका मूल्याङ्कन करने वाला श्राचोचक ही उस संघषं से तरस्थ क्यों हो! क्‍या यह अधिक स्वाभाविक नहीं है कि वह जितना ही जन-साधारण का पक्ष लेगा, उतना ही जन-साधारण का पक्ष लेने वाले साहित्य का मूल भी वह समभेगा £ इसलिये न तो साहित्यकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है, न आलोचक | वे प्रगतिशील तभी होते हैं जब वे जन-साधारण का पक्ष लेते हैं । चोहान ने “आलोचना” ( न॑० ५) में साहित्य और कला की यह व्याख्या दी है, “साहित्य और कला वस्तु चित्रों तथा मानव-चरित्रों की भाषा में जीवन के वैविध्यपूर्ण और परस्पर विरोधी सम्बन्धों और अन्तसंम्बन्धो के यथार्थ को उसके गर्भ में विकासमान संभावनाओं की दृष्टि से मूते और कला- त्मकं सूप में प्रतिबिंबित करती हैं। साहित्य और कला की क्ृतियाँ इसका परिणाम होती है ।” समाज के परस्पर विरोधी संबन्ध और उनके गभ में विकास-मान संभाव- नाओं की हृष्टि--साहित्यकार के लिये दो चीजें आवश्यक हुई, एक तो सामप््निकं यथार्थं जिसका वह चित्रण करेगा, दूसरी वह दृष्टि जिससे वह उस यथार्थ को जाने पहचानेगा । लेकिन न तो हर साहित्यकार यथाथ को एक ही दृष्टि से देखता है, न उससे एक सी सामग्री लेकर साहित्य में चित्रित करता है । इसलिये चौहान की व्याख्या सभी साहित्य और सभी कला पर लागू नहीं होती । यह व्याख्या साहित्य को स्वमावतः प्रगतिशील या स्वभावतः महान्‌ मान कर की गई है | लेकिन गैसा कि हम ऊपर देख चुके हैं, सभी साहित्य प्रगतिशील या महान्‌ नहीं होता । चौहान की व्याख्या में यह भी ध्यान देने की बात है कि सौन्दयैमूलक प्रवृत्ति फिर गायब है | यहाँ केवल दृष्टिकोण, समाज के संबन्धों पर जोर है; इनका माध्यम वस्तुचित्रों और मानव चरित्रों की भाषा है| पतानदहीयह भाषा ~^ ~~




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