मध्यप्रांत, मध्यभारत और राजपूताना के प्राचीन जैन स्मारक | Madhyaprant, Madhyabharat aur Rajputana Ke Prachin Jain Smarak

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(२०)क्षैन अंथोंमें इस समयके 'कल्कि' नामक रानके निन्य सुनिर्योषर भोरी अल्ाचारोंका उछेख दे | उत्तरपुराणमें कहा गया है कि उसने वरिभ्रदरहित सुनियोंपर भी कर छूगाया था । कुछ विद्धान्‌ इस ऋंशिकिराजकी हणवेशी, महा दुराचारी मिहिरकुल ही अनुमान करते हैं | कल्किका अधरमराज्य बहुत समयतक नही चला-४२ वके अधर्म राज्ये भूतरको करेकितकर्‌ कल्कि कुगतिको प्राप्त, हुआ और ऽक्के उत्तराधिकारियोने पुनः घरमैरा्य स्थापित किया ।वीं. द्दावीं शताव्दिसे मध्यभारतमे जेनधरमकी विशेष उन्नतिइई ओर कीतिं फटी । “धारके नरेशोने जन ध्ैको सव अप-নানা, « নহাধিনমূহি ` ने मुञ्चनेरेशसे विशेष प्तन्मान प्रात किया जग उनके उत्तराधिकारी सिन्धुरानकरे एक महाप्तामन्तके भनुरोधसे उन्दने प्रयुन्नचरितः काव्यकी रचना की | ग्वालियर रियाप्ततके चिवपुर्‌ परगनान्तमेत दूबकंडसे मो सं० ११४५का शिलालेख मिला है उत्तमें तत्कालिक रामवेश परिचयके अतिरिक्त 'लादवागठ! गणके आचायोकी परम्परा दी है। टस परम्पराके, आदिमुरु देब- मेन कहेगये हें. (४० ७३-७७)। ये देवसेन संभवतः वे ही हैं मिन्‍्होंने संवत्‌ ९९ ०में दरश्शनसार नामक एक मनन ऐतिहासिक गथकी रचना की थी। इनके बनाये हुए संस्कृत, आरृत और भी अनेक ग्रन्थ पाये जाते हैं । नोनदेवके समयमें अनेक प्र्तिछ॒२ जेमाचाये हुए है । बह्मदेव टीङाक्ारफे अनुपार द्व्यह अथके रचविता नेमिचन्द्राचाय मोजदेवके दरबार थे। नयनंदि माचा- येने अपना अपभ्रश् सापाका एल काव्य सुदर्भनचरित्र' भी इन्हींके राज्यमें सं० ११० ०में समाप्त दिया था नेसा उसकी परशस्तिम हैः-१९




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