साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध | Sahityakar Ki Astha Tatha Anya Nibandh

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Sahityakar Ki Astha Tatha Anya Nibandh by महादेवी - Mahadevi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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साथ मन का रहित नहीं हो सकता, उनकी निकटता संघर्ष की जननी है ४ इसी से आज के युग में मनुष्य पास हे, ক্লু मनुष्य का इवगकुल मन पास थाने दालो से दूर होता जा रहा है । स्वस्थ आदान-प्रदान के लिए मनों वी দিণরা पहली आ्रावश्यकता है 1 निकट्ता की स्थिति-मात्र से राष्ट्र को सावधान करते हुए उन्होंने अपनी उम सांस्कृतिक मन की निकटता एवं एकता को जगाने का आश्रह किया है जो, हमारी बुद्धि मे अभेद और हृदय मे सामंजस्य की स्थापना से मानवन्मात्र की भीतरो एकता का भावत करती चली शा रही है। इस यत्रयुग की कठोर, किन्तु विधाल छाया मे यदि टेम सहज मानचीय वेदना कँ प्रका को विकीर्ण कर सकं, तौ हेमारौ सल्छृतिक परम्परा का गौरव तो वदेगा ही, हम भी श्रपने को उसके सच्चे उत्त राचिकारी घोषित करने का अधिकार प्राप्त कर सकेंगे । वैज्ञानिक युग की निकट की दूरी से बचने के लिए हमे महाडेवी जी का यह कथने स्मरण रखना होगा-“जब भावयोगी मनुप्य, मनुष्य के निकट पहुँचने के लिए द्वव्य पर्व॑तं अरर दृम्तर्‌ समुद्दो को पार करने मे वर्षो का समय विताता थी, उस युग में भी मानवमात्र दी एकता के वही देतालिक হই ই গা जब विज्ञान ने वर्षो को घटो में बदल दिया है, तव वे भनुप्य से अपरिचित कयो रहने दे , बुद्धि को बुद्धि का आतक क्यो बनने दे' और हृदय को हृदय के विरोध में क्यों खड़ा होने दे । हम विव्व भर से परिचय की यात्रा में निकलने के पहले यदि अपने देश के हर कोने से परिचित हो ले तो इसे घुभ शकुन ही मानना चाहिए । यदि घर में अपरिचय के समुद्र से विरोव और राजकला के के बादल उठते रहे, तो हमारे उजले प्ंकल्प पथ भूल जायेगे । अतः आज दूरी को निक- टता बनाने के महतं मुहूर्त में हमे निकट की दूरी से सावधान रहने की आवश्यकता 1 इस कृति के अध्ययन से यह स्पष्ट हौ जाता है कि महादेवी ने साहित्य की जीवन व्यापी विविघता और उसमे प्रतिफलित होने वाले प्रायः मभी महत्वपूर्ण विपयों को लेकर इतने विस्तार और इतनी गहनता से विवेचन किया हैं कि তত पाठक के मन में भाव-दिचार, सक्तन्‍्य-भावना, व्यव्टि-समप्दि, राष्टर-परराष्ट्र, जड़- चेतन, नू््म-रथूल, ययार्य-प्रादर्न, सामग्रिक्ता-थाश्वतता, ज्ञान-विज्ञान, अग्लीलता, प्रत्यक्ष-परोक्ष, परम्परा-प्रभति, सन्यता-संस्कृति, सुप-कुछूप, शिव- सौन्दर्य, नूतन-पुरातव, भौतिक्त्ता-आध्या व्यात्मिकता, एकता-अनेऊता, अतोीत-दर्त- भावन-चितन, सुख-दु.ख, श्रधिकार- अधिकारी, सिद्धान्त-फ्रित्रा, धर्मम, कंठोर-कोमल, राम-विसन, युद-सान्ति, घोषकन्योपित, नँतिव-अर्न॑तिक, स्वभाव- स्कार, मूर्त-अमूर्त, हास-विकास, बलीलत्ता- मान, वाह्यजनत्त-अन्तर्जंयत, बुद्धि-हदय, २०




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