हमारी श्रंङ्खला की कड़ियाँ | hamaaree shrannkhala kee kadiyaan

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1516 Srankhla Ki Larkiyan; (1947) by

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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¢ की कड़ियाँ \७ का उलक्घन कर जाती है। अपने पूर्ण से पूण विकास में भी एक वस्तु दूसरी नहीं हो सकती, यहो उसकी विशेषता है, अतः उससे जो भिन्न है उसका अभाव अवश्यम्भावी है। अपने पूर्ण से पूण गौरव से गौर- वान्वित स्रो भी इतनी पूण न होगो कि पुरुषोचित स्वभाव को भी अपनी प्रकृति में समाहित कर ले, अतण् मानव-समाज मे साम्य रखने के लिए. उसे अपनी प्रकृति से भिन्न स्वभाववालें का सहयोग श्रेय होगा | इस दशा में प्रतिद्वन्द्रिता सम्भव नहीं | उसे श्रपने गुरुतम उत्तरदायित्व के अनुरूप मानसिक तथा शारीरिक विकास के लिए विस्तृत स्वाधीनता चाहिए.। कारण, सट्ढीणता में उसके जीवन का वैता सवंतोन्मुखी विकास सम्भव ही नहीं जैसा किसी समाज की स्वस्थ व्यवस्था के लिए. अनिवाय है| मनुष्य अपने स्वभाव में कुछ संस्कार लेकर जन्म लेता है जिनके, परिस्थितियों के वातावरण में, विकतित होने से उसका चरित्र बनता है। इसके अनन्तर उसके जीवन का वह अध्याय प्रारम्भ होता है जिसमें उसके चरित्रजनित गुण- दोप संसार पर प्रतिकलित होने लगते हैं और संसार के उसके जीवन पर । सवके अन्त में बह प्राकृतिक नियम के द्वारा, अनेक मधुर-कढु अनुभवों का सश्बव कर अपने जीवन के पयवेक्षण को तथा अपने अनु- : भ्ों को दूसरों के मार्ग का दीपक बनाने का अवकाश पा लेता है। निस परित्विति रूपी साँचे में उसके चरित्र को ढलना पड़ता है वह यदि विपरीत, अनुपयुक्त या विक्ृत हो तो चरित्र पर भी उसकी अमिट छाप / रहे जायगी और यह कहने की आवश्यकता नहीं कि विकृत चरित्र ओर “ अलनुप्रयुक्त मानसिक विकरासवाला व्यक्ति अपने निर्दिष्ट स्थान में न ८ / स्वयं स्वामज्ञख का श्रनुमव करेगा, न क्रिसी क करने देगा श्रौ श्रन्त




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