अमृत की बूँदें | Amrit Ki Buden
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
23 MB
कुल पष्ठ :
177
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)धम, सदाचार १५२८ |
देवता भाव का भूखा है, न कि पूजा की सामग्री का।
--बालगंगाधर तिलक
५.
दूढता फिरता हूं ই इकबाल” अपने-आपको ।
आप ही गोया मुसाफ़िर, आप ही मंजिल हूं मैं ॥|
३०
अपने मन में वकर पाजा सुरागे जिन्दमौ
¢ तू अगर मेरा नहीं बतता न बन अपना तो बन॥ --इक़बाल
| ३१
समुद्र में रहनेवाला बिंदु समुद्र की महत्ता का उपभोग करता है, परंतु
उसका उसे ज्ञान नहीं होता । समुद्र से अलग होकर ज्योंही अपनेपन का दावा
करने चला कि वह उसी क्षण सूखा। इस जीवन को पानी के बुलबुले की
उपमा दी गई हैं । इसमें मुझे जरा भी अतिशयोक्ति नहीं दिखाई देती ।
-मो. क. गांधी
: ४:
धमे, सदाचार९
£ संभेपात्कथ्यते धर्मो जनाः कि विस्तरेण वा ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ --व्यास
“है मनुष्यो ! अधिक कटने से क्या लाभ ! हम संक्षेप मे तुम्हें धर्म का
तत्व बता देते हू । परोपकार करना पुण्यकमं हँ ओर दूसरों को पीडा देना
पाप है ।न
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधायंताम् ।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥ “-व्यास
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