जय गोमतेश्वर | Jay Gomteshwar

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : जय गोमतेश्वर  - Jay Gomteshwar
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अक्षयकुमार जैन -Akshay Kumar Jain

Add Infomation AboutAkshay Kumar Jain

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
हुआ है । कहा जाता है, किसी समय यह सरोवर निश्चय हो उस क्षेत्र का अत्यन्त आकर्षक स्थान था। इस नगर की जनसंख्या ४-५ हजार है । इसके उत्तर में चन्द्रगरि और दक्षिण में विन्ध्यागिरि अथवा इन्द्रगिरि नाम की दो पहाडियां हैं। इन दोनों के मध्य यह भाग्य- शाली गांव बसा हुआ है ।विन्ध्यगिरि समुद्र तल से ३३४७ फुट और आसपास के मदान से ४७० फट ऊचा है। ट्स पर भगवान गोम्मटेश्वर-बाहुबली की विशालकाय कलात्मक ५७ फूट ऊंची विश्व विख्यात अखण्ड शिला की खडगासन प्रतिमा विराजमान है ।प्राचीनताजनश्रति तो यह है कि दक्षिण भारत मे वनव्राग के काल में मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र यहां पधारे थ और उन्होंन बाहुबलि की एक বলল प्रतिमा यहा स्थापित की थी किन्तु आज रामायण काल की प्रतिप्टित उस प्रतिमा का कही पतला नहीं है। यह পায্ণলিলামিন্ধ জল श्रति है ।किन्तु इतिहास बताता है कि जनों के २४वें तीर्थकर भगवान महावीर क परिनिर्वाण कः लगभग इढ सौ वर्ष बाद मगध्र देश में अस्तिम श्रतकेवली स्वामी भद्रबाहु मुनीन्द्र विराजमान थ । कहा जाता है कि अंतिम श्रतकेवली भद्रवादु वगान के रहले बाल श्र किल्तु सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के आचाये होने के कारण पाटलीपुत्र मे आकर रह रहे थ । उस समय इतिहास प्रसिद्ध मौय सम्राट चन्द्रगुप्त उज्जयिनी में राज्य करते थे (2১ पृ० २६६ से ३२१ तक) वे छह মাল নাল্লী- पुत्र और छह मास उज्जयिनी मे रहा करते थ।इन स्वामी भद्रवाट्‌ के जैन साध बनने की हड़ी गाचक कथा




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now