कल्याण | kalyan
श्रेणी : इतिहास / History

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
29.33 MB
कुल पष्ठ :
438
श्रेणी :
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लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :
मोतीलाल जालान - Motilal Jalan
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हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar
He was great saint.He was co-founder Of GEETAPRESS Gorakhpur. Once He got Darshan of a Himalayan saint, who directed him to re stablish vadik sahitya. From that day he worked towards stablish Geeta press.
He was real vaishnava ,Great devoty of Sri Radha Krishna.
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)रद. का पीख्धरते 3
+ समस्तस्मे वराद्य लीठयोद्धरते मददीमू #भंगवाद् यज्ञ वराहकी पूजा एवं आराधन-विधिघेरा: कंस्याण वितरतु स चः कटत्पचिरसे
चिनियुन्वज्लोदन्वनमुद्रकमुर्वीसुद वहन ।
खुराधाततरुस्यत् . छुलशिखरिकूटमबिलुवजू-
वराहपुराण ( अध्याय १२७-२८ )के दीक्षासूत्रमं
साच्चिक 'गणान्तिका दौक्ष की विधि निर्दिष्ट है, पर
वहाँ भगवान् वराइकी सर पूजाविधि एवं मन्त्रादि नहीं हैं ।
बैसे दीक्षा एवं सन्त्रपर *अथातो दीक्षा कस्य'से
न्राह्मण' आदि वैदिक प्रन्थोंमें भी पर्याप्त सामग्री है, पर इन्हें
यहाँ अन्य पुराणों एवं आगमोंके अचुसार यज्ञ वराइविष्युकी
आराधनांकी विधि देनेका प्रयन्न किया जा रहा है। पूजा-
पूव दीक्षा आवश्यक है. । घातुपाठमें
धातु बहुर्थक है और १६०१ पर पठित है । जेसे
“अब? घातुके २१-२२ कथ हैं, बेसे ही इसके भी ५-६
हैं । इस प्रकार भी यह आगमोंके विचारका प्रमापक
है । उनके अनुसार “दिव्य ज्ञान” दीक्षासे ही होता है---
दीयते. दिव्यचिज्ञान॑ _ झीयते. पापसंयः 1
अतो दीसेति सस्मोक्ता सुनिशिस्तत्वद्दिसिः ॥
पद्दाकपिल-पाश्वरात्रः तथा भी दीक्षा
छावश्यक निर्दिष्ट है । पुस्तककों देखकर मन्त्र
जपना सब्र हानिकारक बताया है---
पुस्तकालिखितों मन्दों येन खुन्दरि जप्यते ।न तस्प जायते सिद्धहोनिरेव पदे पढ़े ॥
( सहाकपिर पाह्० कुलान १५ । २२ )फिर इसके वि”, 'शाम्मवा, इष्टिजनि
'निवाण', 'ब्ण!, 'पूरण, 'शक्तिपात आदि अ
मेद उन आगमोंमें तथा 'वराहपुराण'में भी निर्दिष्ट है
इनमें तत्काल पाश-पाप-सुक्तिपूवक दि
मावकी प्राप्ति होती है और जीव साक्षात् शिवखर
हो जाता है--
युरूपदिष्रमा्गण ... देघे... कुयोद्िचिक्षण ।
पापसुक्त' क्षणाच्छिष्यदिछिन्नपाशस्तथा भवेत् ॥
बाहमाब्यापारनिसुंक्तो भूमी पतति तत्क्षणात्!
सर्च जानाति शाम्भवि !
चेघविद्धः शिवा साक्षान्न पुनर्जन्म्ता घ्जेत् ॥'
( घडन्वयमहदारत्न; कुलाव १४ | ९०-१३
दीक्षानिधि सर्वत्र प्राय 'वराहपुराणक्रे' अ० है २७१
'दीक्षासूत्रके समान ही निर्दि है । पर मन्त्रदीर्शा'
राशिचक्र, 'अकडम' भादिं चक्रोंसे
भी आवश्यक है । पर यदि खप्नमें कोई दीक्षा देता है
तो उसमें किसी प्रकारके बिचारकी आवश्यकता नह
है । इसी प्रकार सिद्ध देवता या दत्तानियादि पहिया
द्वारा ध्यान, समाधि या प्रत्यक्ष-आप्त भी को!
विचार आवश्यक नहीं है---
'सिदसारखततन्त्रके अनुसार तो 'वाराइमतां
भी ऋणि-धनी या अकडम, अकयद भादि दोधनकीआवश्यकता नहीं है--... | परम ४४८ पा 1के (के) «(के ) दीक्ष--प्मौण्डेज्योपनयननियमत्रतदिशेषुः | नियमसंयमः; ( म्वादिंगण ६०१ ) |
| ख के ए1पंवाए8 स; अनुसार 'ताण्क्य-ज़ाइण २१४१८
सोमयाग; युद्ध, तत्परता व्यर्योगि भी यद दीक्ष घाठ प्रयुक्त है...
( ग ) “घातुकाब्यशकी “पदचन्द्रिकाः ब्याख्याके स्मनुसार ये मुख्य ही अनेक
गु्ादिनन्दे ते त्रतमस्त्विति शासनाद् । स्पाचार्यों दीक्षते वाग्मी यजमानस्व मगिवः ॥ त्तपसे से. मदबतमू ।? ( ₹ ! 5६०१की पंदचन्द्रिका ) ।पऐतरिय न्ाहमण! ४। २५ ममिास्त आदिमदद माने ईै-ए करिए,
पिन््यें तन शादीहर मर्दर्षि जद कि ट्व्यि मावतना दर ह््मां दया 1 |
उदाइरण महर्षि हैं | इन्दोनि झलक) यु प्रह्मदादिकों स्पर्थ-मात्रऐे दिव्य पदुचा 5?यूं कारण
एवं क्ञानवद्धक हैं ।यहुतसे मद्वपूर्ण रै८८ केबाद दिये गये हू, झा बाप
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