वक्रोक्तिजीवित | Vakrokitjeevit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पूर्व वुत्त भूमिका [१५ द्ण्डी भामह के उपरान्त दण्डी ने भी काव्यादर्श में वक्रोक्ति की चर्चा की है । उन्होने वाइमय के दो व्यापक भेद कमि है स्वभावोक्ति भीर वक्रोक्ति ---द्विघा भिन्न स्वभावोक्तियेक्रोक्तितचेति वाइमयम्‌ २1३६२ । स्वभावोतदित में पदार्थों का साक्षात्‌ स्वरुप-वर्णन होता है, वह श्राद्य अल॒कार है --- ॐ नानावस्य पदार्थाना स्प साक्नाद्‌ विवृण्वती 1 स्वभायोक्तिदच जातिद्चेत्यःदा सालकृतियेथा 1 বভ शास्त्रादि में उत्ती का साम्राज्य रहता है--शास्त्रेष्वस्थेव साम्राज्य 1 २११३ । वक्ोक्ति इससे भिन्न है, उसमें साक्षात्‌ श्रयवा सहज वर्णन न होकर चक्र अर्यात्‌ चमत्कारपूर्ण वर्णन होता है, उयमादि अन्य श्रलेकार समी वक्रोक्ति के प्रकार है--उक्रोपितिशन्देन उपमादय सकौर्णपयंन्ता अलंकारा उच्यन्ते (हृदयगमा टोका) 1 इन सभौ फे चमत्कार में, प्राय, किसी न किसी रूप से इलेप फा योग रहता है--इलेपो सवस पुष्णाति प्राय वक्रोक्तिषु श्रियम्‌ 1 २।३६३ । उधर मतिशयोक्ति के परसग दण्डी ने अति- शयोक्ति को भी /सभो अलकारों का आधार माना है : अलंकारान्तराणामप्येकमाहुः परायरम्‌ । २२२० । इस प्रकार एक और बक्तोक्ति को ओर दूसरी और জলি- शयोक्ति को सभी अलकारों फा आधार मान कर भामह को भाँति दण्डी भो दोनों , को पर्यायता सिद्ध कर देते हे । पर्याय हो जाने पर दोनों के परिभाषा भी फिर নর हो जाती है जो अतिशयोक्ति की। दोनों को मूल उद्गम एक हो है 'लोकसौमोति- चत्तिनी विवक्षा' भ्र्यात्‌ वस्तु के लोकोत्तर वर्णन की इच्छा--विवक्षा या विशेषम्य लोकसीमातिबतिनी (२।२१४) । यही लक्षण মান ने भो माना ह । श्रतएवं वक्रोक्ति फे सम्बन्व मे भामह श्रौर दण्डो कामत प्राय एक ही है--दोनो लोकवार्ता से भिन्न वाक्‌-भगिमा को वक्रोक्ति मानते हं, अन्य सभी अलंकार इसी के (आश्रित) प्रकार हे । अन्तर केवल इतना है कि भागह स्वभावोक्ति को भी वक्रोक्ति की परिधि के भोतर मानते हे, परन्तु दण्डो के अनुसार दोनों भिन्न है । भामह के अनुसार स्वभाव- फयन भी अपने दग से वक्र-कयन होगा, परन्तु दण्डो स्वभाव-कयन फो वक़-कथन से निश्चय हौ पृथक तया कम महत्वपूणं मानते है--काव्य के लिए वह्‌ मनिवायं नहीं है--ईप्सित सयवा बाद्यनोय मात्र ह . फाव्येष्ठप्येतदं प्सितम्‌ २।१३1 इस प्रकार वक्कोक्ति के विषय में दण्डी का अभिमत सामह के सत से मूलतः भिन्न नहीं है। न




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