आनंद मठ | Anandmuth

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Anandmuth  by छविनाथ पाण्डेय -Chhavi Nath Pandeyपंडित ईश्वरी प्रसाद शर्मा - Pt. Ishvari Prasad Sharmaबंकिमचंद्र चटर्जी - Bankimchandra Chatterjee

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छविनाथ पाण्डेय -Chhavi Nath Pandey

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पंडित ईश्वरी प्रसाद शर्मा - Pt. Ishvari Prasad Sharma

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बंकिमचंद्र चटर्जी - Bankimchandra Chatterjee

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ॐ दूसरा परिच्छद्‌ १९ थोड़ी देर ओर म्रूख प्यास सह लेती [” फिर विचारा कि चारों ओरके किवाड वन्द्‌ कर दें पर किसी दरवाजेमें किवाड़ नदारद थे, तो किसीके किवाडमें सांकलू ही नहीं थी | इसी तरह वह्‌ चासं ओर देख रही थी कि सामनेके दरवाजेपर एक छाया-सी दील पड़ी। आकार प्रकार तो मनुष्यका- सा मालूम पड़ा, पर शावद्‌ चह मनुष्य नहीं था । अत्यन्त दुबलछा पतला, सूखी ठठरीवाछा, काला नड्ु-घड़ड़, विकदा- कार मनुष्यका-सा न जाने कोन आकर द्रवाजेपर खड़ा हो गया। कुछ देश बाद उस छायाने मात्रों अपना हाथ ऊपर उठाया ओर हड्डी चाप्र भर बचे हुए अपने लम्बे हाथकी लम्बी ओर सूखो उँगलियोंकी घुमाकर किसीको सह तसे अपने पाक्त बुलाया । कव्याणीको जान सूख गयी ! इतनेमें एक ओर छाया उस छायाऊ्रे पास आकर खड़ी हो गयी। यह छाया भी पहली हीकी तरह थी। इस तरद एऋ एक करके न जाने कितनी ही छायायें आ पहुंचीं। सबकी सब चुपचाप आकर घरमें घुस गयीं । वह अन्धक्रास्मय गृह, स्मशान-सा भयंकर मालूम पड़ने खगा ।. इसके बाद उन परेत-मूत्ति योने कल्याण भौर उसक्की कत्याको चारों ओरसे घेर छिया | कब्याणी मच्छित हो गई । तब उन कृष्णवण शीण आकारोंने कब्याणी ओर उसकी कन्याको उठाया ओर उन्हें लिये हुए घरसे बाहर हो मैदान पारकर एक जदुलमें घस गये । कुछ ही देर बाद महेन्द्र घड़ेमें दूध लिये हुए वहां आ पहुंचे। उन्होंने देखा कि कहीं कोई नहों है। उन्होंने चारों ओर बहुत दढा, स्री ओर कन्याका नाम ले लेकर बार बार पुकारा, पर न तो किसीने उत्तर दिया, न क्िसीका पता चला |




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