आनंद मठ | Anandmuth
श्रेणी : साहित्य / Literature

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutChhavi Nath Pandey
Add Infomation AboutPt. Ishvari Prasad Sharma
Add Infomation AboutBankimchandra Chatterjee
लेखक :
छविनाथ पाण्डेय -Chhavi Nath Pandey,
पंडित ईश्वरी प्रसाद शर्मा - Pt. Ishvari Prasad Sharma,
बंकिमचंद्र चटर्जी - Bankimchandra Chatterjee
पंडित ईश्वरी प्रसाद शर्मा - Pt. Ishvari Prasad Sharma,
बंकिमचंद्र चटर्जी - Bankimchandra Chatterjee
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
37 MB
कुल पष्ठ :
210
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :
छविनाथ पाण्डेय -Chhavi Nath Pandey
No Information available about छविनाथ पाण्डेय -Chhavi Nath Pandey
पंडित ईश्वरी प्रसाद शर्मा - Pt. Ishvari Prasad Sharma
No Information available about पंडित ईश्वरी प्रसाद शर्मा - Pt. Ishvari Prasad Sharma
बंकिमचंद्र चटर्जी - Bankimchandra Chatterjee
No Information available about बंकिमचंद्र चटर्जी - Bankimchandra Chatterjee
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)ॐदूसरा परिच्छद् १९थोड़ी देर ओर म्रूख प्यास सह लेती [” फिर विचारा कि
चारों ओरके किवाड वन्द् कर दें पर किसी दरवाजेमें किवाड़
नदारद थे, तो किसीके किवाडमें सांकलू ही नहीं थी | इसी
तरह वह् चासं ओर देख रही थी कि सामनेके दरवाजेपर
एक छाया-सी दील पड़ी। आकार प्रकार तो मनुष्यका-
सा मालूम पड़ा, पर शावद् चह मनुष्य नहीं था । अत्यन्त
दुबलछा पतला, सूखी ठठरीवाछा, काला नड्ु-घड़ड़, विकदा-
कार मनुष्यका-सा न जाने कोन आकर द्रवाजेपर खड़ा हो
गया। कुछ देश बाद उस छायाने मात्रों अपना हाथ ऊपर
उठाया ओर हड्डी चाप्र भर बचे हुए अपने लम्बे हाथकी लम्बी
ओर सूखो उँगलियोंकी घुमाकर किसीको सह तसे अपने पाक्त
बुलाया । कव्याणीको जान सूख गयी ! इतनेमें एक ओर छाया
उस छायाऊ्रे पास आकर खड़ी हो गयी। यह छाया भी पहली
हीकी तरह थी। इस तरद एऋ एक करके न जाने कितनी ही
छायायें आ पहुंचीं। सबकी सब चुपचाप आकर घरमें घुस
गयीं । वह अन्धक्रास्मय गृह, स्मशान-सा भयंकर मालूम पड़ने
खगा ।. इसके बाद उन परेत-मूत्ति योने कल्याण भौर उसक्की
कत्याको चारों ओरसे घेर छिया | कब्याणी मच्छित हो गई ।
तब उन कृष्णवण शीण आकारोंने कब्याणी ओर उसकी कन्याको
उठाया ओर उन्हें लिये हुए घरसे बाहर हो मैदान पारकर एक
जदुलमें घस गये ।कुछ ही देर बाद महेन्द्र घड़ेमें दूध लिये हुए वहां आ पहुंचे।
उन्होंने देखा कि कहीं कोई नहों है। उन्होंने चारों ओर बहुत
दढा, स्री ओर कन्याका नाम ले लेकर बार बार पुकारा, पर
न तो किसीने उत्तर दिया, न क्िसीका पता चला |
User Reviews
No Reviews | Add Yours...