अपराजिता | Aaprajita

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ११ ) दिया गया है । पूर्ववत स्थूल लोकोत्तरता के स्थान पर यद सूद्धमतर अभिव्यक्ति छायात्मक ही कही जा सकती है। इस, काव्य की आध्यात्मिकता भी सुस्पष्ट है यद्यपि वह रूढ़ अध्यात्म नहीं है | अधिकांश “छायावादियों की दाशनिक भित्ति वेदान्त या उपनिषद्‌ है। 9 आत्मा की सत्ता स्वीकार करते हैं | इसके अतिरिक्त उन के काव्य में दो मुख्य विशेपताएँ ऐसी हैं जो उन्हें आध्यात्मिक सिद्ध करती हैं। प्रथम तो उनमें दुःख या निरात्म अन्तिम सिद्धान्त के रूप में शीत नहीं। दूसरे उन्न स्थूल इन्दरियता का कीं भी उल्लेख _ नदीं द । उनकी सौन्दर्य भावना है मानवीय किन्ठ अतिशय सूक्ष्म--आध्यात्मिक | मेरे इस कथन के अपवाद भी सम्भव है मिले, किन्ठु उन अपवादों से नियम की पुष्टि ही होगी। दुःख के आलंकारिक वर्णन तो बहुत मिलेंगे किन्तु दुःख में डूबा हुआ निरात्म दशन छायावाद में विरलता से प्राम होगा। दुःख की वास्तविक और प्रांजल अभिव्यंजना मुझे 'कामायनी? काव्य के कुछ स्थलों में जैसी प्रखर, उत्त और अंधकाराच्छुन्न मिली, अन्यत्र वैसी कहीं नहीं देख पड़ी । किन्तु दुःख रूप दर्शन और तज्जन्य विद्रोह छायावाद काव्य में नहीं देख पड़ता । यह विद्रोह उस अवस्था का द्योतक होता जब दुःख की सत्ता अखंड जीवन की अनुभूति को असम्भव कर देती । जवर शैल शिखर के नीचे आकर यात्री निरुषाय होकर रुक जाता | महादेवी वर्मो_ जी का दर्शन यद्यपि दुःख पर स्थित हे, किन्तु वह ढुःख बौडिक और आध्यात्मिक अडे-स उतरने का उपक्रम मात्र बन गया है। इन्द्रियता के सम्बन्ध में छायावाद काव्य स्थूल भूमि पर नहीं उतरता ।' उसकी अभिव्यक्तियाँ उच्च मानसिक स्तर पर हैं ओर अधिकांश छाया रूप कहीं-कहीं, जैसे पंत जी की “उच्छवास कौ बालिका और «“अन्थि! - के वर्णनों में जहाँ साकारता आए बिना नहीं रही, वहाँ भी वह सांकेतिक ही रक्ली गई दै । कुछ आलोचक तो इसी सकेतिकता कौ छायावाद




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