गहरे पानी पैठ | Gahre Pani Paith

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Gahre Pani Paith by रजनीश - Rajnish

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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यों समझें कि अभी जो हमारे षास से रेडियो बंब्ज गुजर रही हैं हम उन्हें पकड़ नहीं पायेंगे । रेडियो के उपकरण के बिना उन्हें पकडता कठिन होगा । क अमर एक ऐसा वक्त आ जाय कि एक महायुद्ध हो जाय, हमारी सारी टेक्नोलाजी अस्त-व्पस्त हो जाय, और आपके धर में एक रेडियो रह जाय तो आप उसे फेंकना न चाहेंगे । मात लीजिए अब कोई रेडियो स्टेशन नहीं बचा, अब रेडियो से कुछ पकड़ा नहीं जाता, अब रेडियो सुधारने वाला भी मिलना मुदिकल है । हो सकता है दस-पांच पीढ़ियो के बाद मी आपके घर में वह रेडियो रखा रहे और तब कोई पूछे कि इसका क्या उपयोग है? तो कठिन हो जाएगा बताना । लेकिन इतना जरूर बताया जा सकेगा कि पिता आप्रहशील थे इसको बचाने के लिए, उनके पिता मी आब्रहुशीर थे । इतना उन्हें याद है कि हमारे घर में उसको बचाने वाले आप्रहशोल लोग थे, वे बचायें चले गये । हरमे पता नहीं, इसका क्या उपयोग है? आज इसका कोई मी उपयोग नहीं है। और रेडियो को तोडकर अगर हम सब उपाय भी कर ले तो भी इसकी खबर मिलना बहुत मुदिकल है कि इससे कमी सगीत बजा करता था, कि कमी इससे आवाज निकला करती थी । सीधे रेडियो को तोड़कर देखने से कुछ पता चलने वाला नहीं है। वह तो सिरफ॑ एक आप्राहक था, जहाँ कुछ चोज घटती थी । घटती कही और थी, लेकिन पकड़ी जातो थी । ठोक ऐसे हो मदिर आप्राहक थे, 'रिसेप्टिव इन्स्ट्रूमेंट' थे । परमात्मा तो सब तरफ है। आप मी सब जगह मौजूद हूँ, परमात्मा मी सब अगह मौजूद है । लेकिन किसो विशेष संयोजन में आप 'एट्यून्ड' हो जाते है । आपकी “ट्युनिंग' मेल खाती है, ताल-मेल हो जाता है । तो मदिर आप्राइक को तरह उपयोग में आये । वहा सारा इन्तजाम ऐसा था कि जहा दिव्य माव को, दिव्य अस्तित्व को, मगवत्ता को हम प्रहण कर पायें । जहा हम खुल जायें और उसे ग्रहृण कर पाये । सारा इन्तजाम मदिर का वैसा ही था । अलग-अलग लोगो ने अलग-अलग तरह ते इन्तजाम किया था । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि अलग-अलग रेडियो बनाने वाले लोग, अलग-अलग शक्ल का रेडियो बनाये । बाकी, बहुत गहरे में प्रयोजन एक है । इस मुल्क में मदिर बने । और कोई तीन-चार तरह के ही खास ढग के मदिर है, जिनके रूप से बाकी सारे मन्दिर बने है। इस मुख्क में जो मन्दिर बने वह आकाश की आऊृति के हू । यानी जो गुम्बज है मदिर का, वह आका की आकृति में है। और प्रयोजन यह है कि अगर आकाश के नीचे बैठकर में ओम्‌ का उच्चार करूँ तो मेरा उच्चार खो जायगा । क्योकि मेरी शक्ति बहुत कम है, विराट आकाश है चारो तरफ । मेरा उच्चार लौटकर मुझ पर नही बरस सकेगा । मं जो पकार कषणा, वह्‌ पुकार मुझ पर लौटकर नहीं आयेगी, बह अनत १६




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