संचयिका भाग १ | Sanchieka Bhag-1
श्रेणी : भाषा / Language

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
133
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)2 संचयिक ,
खेत में मिला था । उन्होने उससे कहा था, भाई ! थोड़ा गन्ने का रस
पिला सकते हो ।
हाँ . . . हाँ . . . आप बैठिए । मैं अभी लाया ॥
अकबर एक पेड़ की छाया में बैठ गए । वह किसान खेत में गया । एक
गन्ना तोड़ा और एक बड़े लोटे में रस निकालकर ले आया ।
अकबर ने गन्ने का रस पिया तो बहुत खुश हुए ।
अरे वाह ! ऐसा रस तो हमने पहले कभी नहीं पिया ।
जी, और यह सिर्फ एक ही गन्ने का रस है ।'
क्या ?” एक गन्ने में इतना सारा रस ! अकबर को आश्चर्य हुआ।
मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ , हुजूर ! ”
कमाल की बात है |
ये हमारे बादशाह की नीयत का कमाल है जनाब । अगर उनकी
नीयत ठीक न हो, तो गन्नों में रस ही न निकले ।
अच्छा, कितना लगान देते हो ?
जी, लगान तो सिर्फ पच्चीस पैसे ही देने पड़ते हैं ।
सिर्फ पच्चीस पैसे ! बादशाह ने हैरान होकर पूछा । फिर वे सोचने
लगे कि' ऐसे रसवाले गन्ने के खेत पर तो काफ़ी रुपए लगान लगाना
चाहिए। ठीक है, आगरा पहुँचते ही इसका लगान बढ़ा दूँगा ।
कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद अकबर ने कहा- अच्छा
भाई, चलने से पहले ज़रा एक लोटा रस और पिला दो ।
किसान लोटा लेकर चला गया । उसने एक गन्ना तोड़ा लेकिन इस बार
लोदा न भरा, फिर एक के बाद एकं तीन-चार गत्रे तोड़े ओर उनका रस
निकाला, फिर भी लोटा न भरा ।
अकबर उसका इंतजार कर रहे ये । सोच रे थे - इस बार तो इसने
देर कर दी । तभी किसान मुँह लटकाये हुए आया और लोटा बादशाह की
तरफ बढ़ा दिया । लोटे में रस थोड़ा-सा ही था ।
अरे ! क्या बात है ? इतना कम रस लेकर क्यो आए ?
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