श्री इष्टोपदेश टीका | Shree Ishtopdesh Teeka

Shree Ishtopdesh Teeka by ब्रह्मचारी शीतल प्रसाद - Brahmachari Shital Prasad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(1७) मुनेछाक जिनेश्वरदास, गोटावाढे, विक्टोरिया सीट | , < बरातीलाहं जैन एण्डको ° भनरर भरट महियांन। बरातीरार चिरजीरार बरतनवरि, धमीनाबाद्‌ | ला० दामोद्रदाप्ीमे एक विशेष गुण यह था कि दे इस तरहसे भन्योफि -साथ व्यवहार फते ये कि उनका कोई शत्रु नहीं होता था किन्तु सबे मित्र ही रदते थे । सभामें भापके भाष- णका ऐसा असर पढ़ता था कि जिप्त कार्यको आप मनमे ठन हेते थे कि होना चाहिये उप्त कायेको आप करके ही रहते थे, बढ़े २ कठिन कार्योमें छोग आपकी सम्मति हेते थे, भाप कचहरीके कार्यों बढ़े चदुर थे। वकीछोंको भी आपकी सम्मतिसे काम पहुचत। था । शरेतताम्बर नैन समानके साथ नो शिखरनीकी पूजाका मुकदमा चला था, उसमें आपकी प्रमाणिक गवाहीका हाईकोरटोके जर्गोपर भी भर पडा है | धर्मके कार्यमें आप हरतरह मुततेद रहते थे । लखनऊ 'जो कुछ धर्मकी रौनक थी वह पव शापे गाढ परयः लक्ञा फल था । भाप चे समाप समापदभि हन्तनाएम ॐ रहते - य, कमी घव्हति न ये । आपके पेये एते ही रलनञ माव : उसके आधीनकी संस्थाएं बराबर चरती रहीं जीर णवत वे च रही है जिसमें प्रयन उनहींके सुपुत्रका है । पथ दै धमासा रपे पन्ये उदये कमी कमी २ उनके प्श पतर दी होत है। आप इतने परोपकारी थे कि अपनी जातिमें व अन्य कोई भाई या बहन जापसे द्रव्यकी इच्छा करते तो भाप फोरन उधार देकर उसका काम निकाठ देते ये | नेन समाचार पा बरार पठते थे | यदि कोई कट व हानि हो नादी थी तो आपका मन मेद- विज्ञानसे उत्तका दुख नहीं मानता था । णप पदा प्प्जषुत




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