जिनागम ग्रंथमाला ग्रंथांक १९ , उत्तराध्ययनसूत्र | JInagam Granth Mala 19,[ Uttaradhyayana Sutra ]

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JInagam Granth Mala 19,[ Uttaradhyayana Sutra ] by मिश्रीमल जी महाराज - Mishrimal Ji Maharajराजेंद्र मुनि - Rajendra Muni

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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थी, सुदीधं चिन्तन के पश्चात्‌ वि स २०३६ वैशाख शुक्ला दशमी, भगवान्‌ महावीर कंवल्यदिवस को यह दृढ निश्चय घोपित कर दिया श्रौर ग्रागमवत्तीसी का सम्पादन-विवेचन कायं प्रारम्भ भी । इस साहमिक निणंय में स्व गुरुभ्राता शासनसेवी स्वामी शी ब्रजलाल जी म की प्रेरणाप्रोत्साहन तथा मामंदर्गन मेरा प्रमुख सम्बल वना ह्‌। साथ ही भ्रनेक मुनिवरो तथा सदगृहस्थो का भक्तिभाव भरा सहयोग प्राप्त हुश्रा दै, जिनका नामोल्तख क्रिय विना मन सन्तुष्ट नही होगा । ब्रागम श्रनुयोग शैली के सम्पादक मुनि श्री ऋन्दैयालानजी म० ““कमल”*, प्रसिद्ध साहित्यकार श्री देवेन्द्रमुनिजी स० शास्नी, आचाय श्री गरात्माराणजी म के प्रपिप्य भण्डारी श्री पदमचन्दर्जा म° एव प्रवचन्‌- झूषण श्री श्रमरयुनिजी, विद्वदुरत्न श्री ज्ञानमुनिजी म०, स्व० चिदुपी महासती श्री उर्ज्वलकुवरजी मण कौ सुशिष्याएं महासती दिव्यप्रभाजी एम ए, (पी-एच डी, महासती मुक्तिप्रभाजी तथा विदुपी महासती श्री उमरावकु वरजी म० श्रच॑ना', विश्रुत विद्वान्‌ श्रौ दलसुखभाई मालवणिया, मुख्यात विद्धान्‌ प० श्री शोभाचन्द्रजी भारिल्ल, स्व प श्री हीरालालजी शास्त्री, डा० छगनलालजी शास्त्री एव श्रीचन्दजी सुराणा ““मरस'* श्रादि मनीषियो का सहयोग अ्रागमसंम्पादन के इस दुरूहं कायं को सरल वना सका है । इन सभी के प्रति मन श्रादर व कृतज्ञ भावनासे भर्भिश्रूतहै। इसी के साथ सेवा-सहयोग को र्ट से सेवाभावी शिष्य मुनि विनयक्रुमार एव महेन्द्रमुनि का साहृचर्यं-सहयोग, महासती श्री कानकु वरजी, महासती श्री कणकारकू वरजी का सेवाभाव सदा प्रेरणा देता रहा है 1 इस परसग पर इस कायं के प्रैरणा-स्रोते स्व ० श्रावक चिमनसिहजी लोटा, तथा श्रौ पुखराजजी सिसोदिया का स्मरण भी सहजरूपमे हो भ्राता है, जिनके अथक प्रेरणा-प्रयत्नो से श्रागम स्मिति श्रपने कार्य में इतनी शीघ्र सफल दहो रही है । चार वषं के दस भ्रल्पकालमे ही उन्नीस ्रागम-जिल्दो का मुद्रण तथा करीव १४-२० आगमो का श्रनुवाद-सम्पादन हो जाना हमारे सव सहयोगियो कौ गहरी लगन का यौतक हं । मु सढ विश्वास है किं परम श्रद्धेय स्वर्गीय स्वामौ श्री हजारीमलजी महाराज ग्रादि तपोपूत ब्रात्माश्रोके शुभाशीर्वाद से तथा हमारे श्रमणसचघ के भाग्यशाली नेता राप्टर-सत प्राचां शी भ्रानन्दक्ऋपिजी म० श्रादि मुनिजन के सद्‌भाव-सहकार के बल पर यह्‌ सकल्पित जिनवाणी का सम्पादन-प्रकाशन कायं शीघ्र ही सम्पन्न होगा । इसी शुभाशा के साथ, --सुनि मिश्नीमल “मधुकर” (युवाच) 17} [१४]




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