श्रृंगार - शतक | Shringar Shatak

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एक विचार :

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महाराज भर्तृहरि लगभग 0 विक्रमी संवत के काल के हैं
ये महाराज विक्रमादित्य के बड़े भाई थे और पत्नी के विश्वासघात
के कारण इनमे वैराग्य उत्पन्न हुआ

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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व द म्यज्ञार-शतक १३ चब्चल अचपल मेंटके-चटके सर .खोले-ढाँके हूँस--हूँस के । कह-कंह की हँसावट और गजूव ठठुठों की उंडावट वैसी ही ॥७॥ हर वक्त फबन हर आन संजै दस-दम मे बदलें. साख सजे । बाहौ की झपट रू घट की अदा जीवन की दिखावट वैसी ही ॥८॥ पाठक । मनचले पाठक आप ही विचारिये इन आन-वान भर सूवसुरतीवाली को कौन-श्रुल सकता है जो इन स्त्ी-रतनो की कट्ठ जाननेवाले हैं उनकी नजरों से इनके नीलकमल की भाभा रखने वाले-नीलम-से नेत्व-कभी उतर ही नहीं सकते । उन्हें तो हर भोर नीलम या भीलकमल ही नीलकमल फूले दीखते हूँ और वे मन-ही-मन उनकी अनुपम छटा को याद कर-करके-प्रसन्न होते हैं । गए ता भय नर के ही कलह सौह्ट को भग+ कवह लज्जायुत...दरसत । - ₹ ८ ४. केवहुक/ससकत संकि क़बह लीलारस वरसत़ 1 +. हग + - नैलहुक-मुख मुदुहास कबहुः हितदबचन उन्ाइत ॥ 5 7 । - कवहुक लोचक्त. फेर चपल चहु -ओर निह्मस्त-। ५ + १ छिन-किन्त सुचसिल्न विचित्र कृषि भरे कमल -जिस़ि दशहू दिशि ॥ ऐसी अत्रुप नारी निरखि हरषत इखिये दिवस--र्तिशि ॥४॥ £ सार-+-जिस तरहाश्रह्मज्ञानियो को। हर ओर न्रहमदही-ब्रह्म दीखता है उसी तरह कामियो क्रो हर ओर नवब्रघुओ के नील-कमल के समान न्नन्नल् जेत्रम्ही-नेत्र दीखते है । जिसकी अआपो मे तुजो सभा जाता है उसेःवह्दी-वह दीखता है।. -५ हा व... ससिकर नशा्ि-लिंढ-प्पापप्राइ -फहा- 9कूपथि - णिण्णाइ जा जाए पड़ ईध्ण6 छ8 8णि पाट55 . जा 18. साधियाल स्क्रिपिघिह55 थाते सिवा जा हटा एंविशपा ध5 पाट5 घ6 8८6... 08 भणणाछट फ़णा8ा विश है पशु ठप. करो डा . प्र्ंकड सुएडी- ८8पणाई ब00685 परत? हज भावँ। छावटाए छििटड पिला कप 10 दर हे हे. परेड सिनंत सि.रिनक्वाउ डाक उप




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