श्रृंगार - शतक | Shringar Shatak

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी : ,
शेयर जरूर करें
Shringar Shatak by भर्तृहरि - Bhartṛhari

एक विचार :

एक विचार :

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

भर्तृहरि - Bhartṛhari के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
व द म्यज्ञार-शतक १३ चब्चल अचपल मेंटके-चटके सर .खोले-ढाँके हूँस--हूँस के । कह-कंह की हँसावट और गजूव ठठुठों की उंडावट वैसी ही ॥७॥ हर वक्त फबन हर आन संजै दस-दम मे बदलें. साख सजे । बाहौ की झपट रू घट की अदा जीवन की दिखावट वैसी ही ॥८॥ पाठक । मनचले पाठक आप ही विचारिये इन आन-वान भर सूवसुरतीवाली को कौन-श्रुल सकता है जो इन स्त्ी-रतनो की कट्ठ जाननेवाले हैं उनकी नजरों से इनके नीलकमल की भाभा रखने वाले-नीलम-से नेत्व-कभी उतर ही नहीं सकते । उन्हें तो हर भोर नीलम या भीलकमल ही नीलकमल फूले दीखते हूँ और वे मन-ही-मन उनकी अनुपम छटा को याद कर-करके-प्रसन्न होते हैं । गए ता भय नर के ही कलह सौह्ट को भग+ कवह लज्जायुत...दरसत । - ₹ ८ ४. केवहुक/ससकत संकि क़बह लीलारस वरसत़ 1 +. हग + - नैलहुक-मुख मुदुहास कबहुः हितदबचन उन्ाइत ॥ 5 7 । - कवहुक लोचक्त. फेर चपल चहु -ओर निह्मस्त-। ५ + १ छिन-किन्त सुचसिल्न विचित्र कृषि भरे कमल -जिस़ि दशहू दिशि ॥ ऐसी अत्रुप नारी निरखि हरषत इखिये दिवस--र्तिशि ॥४॥ £ सार-+-जिस तरहाश्रह्मज्ञानियो को। हर ओर न्रहमदही-ब्रह्म दीखता है उसी तरह कामियो क्रो हर ओर नवब्रघुओ के नील-कमल के समान न्नन्नल् जेत्रम्ही-नेत्र दीखते है । जिसकी अआपो मे तुजो सभा जाता है उसेःवह्दी-वह दीखता है।. -५ हा व... ससिकर नशा्ि-लिंढ-प्पापप्राइ -फहा- 9कूपथि - णिण्णाइ जा जाए पड़ ईध्ण6 छ8 8णि पाट55 . जा 18. साधियाल स्क्रिपिघिह55 थाते सिवा जा हटा एंविशपा ध5 पाट5 घ6 8८6... 08 भणणाछट फ़णा8ा विश है पशु ठप. करो डा . प्र्ंकड सुएडी- ८8पणाई ब00685 परत? हज भावँ। छावटाए छििटड पिला कप 10 दर हे हे. परेड सिनंत सि.रिनक्वाउ डाक उप




User Reviews

अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :