उठो जागो | Utho Jago

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Utho Jago by मुनि बुद्धमल्ल - Muni Buddhamllमोहनलाल - Mohanlal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अनुवादक कीओरसे अन्तश्चेतना कै विराट्‌ वीचिमाली के जीवन्त भौर प्रेरणात्मक लहर का कलामय पद्धति से व्यक्तीकरण साहित्य है। अन्तरात्मा मे रही तेजस्विता और सतत कर्मण्यता इसमे प्रस्फूंटित होती है। इसलिए यह लहर लहरी-परम्परा की सर्जक भौर उद्बोघक वनती है । अदृध्य की तीत्र अनुभूति तथा यथाथें के क्षितिज से उठी हुई उसकी उच्च कल्पना जब भावना के प्रखर वेग में शब्दबद्ध होकर बहती है तो एक नया ससार रच देती है, जो कि अमर और अज्ञात होता है । साहित्य का यह्‌ उत्स अनुन्नत भौर नीरस हुदय से नही फूट सकता । इसके पीछे गहरी सवेदनशीलता तथा अन्त करण की प्रबुद्ध भावना का दवाब होता है । साहित्य हृदय का बोल होता है, इसीलिए वह्‌ सीधा हृदय को छता है, सहलाता है और मर्माहत भी करता है। जीवन के दिशा-निर्धारण मे अप्रतिम सहयोगी तो वह बनता ही है । इसकी जो डाट-फटकार पडती है, वह वहत अस्य होती है और अन्तस्‌ को इतना उद्देलित तथा प्रताडित करती है कि उसका एक-एक तार वेदना की प्रखरता से सिहर-सि हर उठता है। उसे शत-शत शिक्षाए एव लाख-लाख उपदेश जो नया मोड नहीं दे पाते, वह यह आकस्मिक ही दे डालती है। मन की कुण्ठा को तोडना भौर उसमे विशालता का अमृत भरना सबसे कठिन कायं है । साहित्य इसे अनायास ही सम्पादित कर देता है । उठने, जागने और सतत चलने की शाश्वत प्रेरणा ही साहित्य की आत्मा है। इसी आत्मवत्ता के कारण वह चिर स्थायी ओर युग-युग श्लाध्य बनता है ।




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