प्रकाशन समाचार | Prakashan Samachar

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
250 MB
कुल पष्ठ :
501
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)म स नमे प = दव 3 न ल ह 1.ककी मावनाशं मैं विश्ज्लक दोती दै वही च्रपनौ कलय
नाश्नो को क्रियान्वितं करने की बात सोचता दे |
यदि ऐसा न होता तो हम सवने श्रब तक श्पने माष
बहनों का गला .घोट दिया होता, हर किसी स्त्री के साथ
व्यभिचार करने प्रर उतर श्रादे श्र दपने मातार्जपता
को तिलांजलि दे दी होती श्रोर जिस किसी ने भी किसी मां
प्रकार हमारा विरोध किया है उसे मार-मारकर उसका
कचूमर निकाल दिया होता । जैसा कि एक प्रख्यात वाल
सनोविज्ञानवेता ने कहा है, “व्यक्ति सतत इस सा में
लीन रहता है कि बह ्रंतरिक तथा ब्राह्म वास्तविकता
को एक-दूसरे से अलग रखते हुए भी उनमें परस्पर-सम्बन्ध
बनाए रते |” एक सामान्य बालक तो ऐसा कर सकता है,
` प्र मानसिक रूप से उद्विम्न प्रौढ व्यक्ति की तरह उद्धिग्न
बालक भी इन दोनों जगत को श्रापसमे मिला देता है
और फलस्वरूप वह् श्रपनी कल्पनाओ्ं को क्रियान्वित करने
लगता है श्रौर या तो श्रपने माँ-बाप को छोड़कर भाग
जाता है या उन्हें पहाड़ पर से नीचे ढकेल देता है । परन्तु
मुभे द्द् विश्वास है कि श्ाज तक किसी भी पुस्तक को
पढ़ने की वजह से कोई भी ऐसी पिस्तोल नहीं चलाई गई
निसकी लवली पर पहले ही से कोई उंगली कोपि नहीं र्दी
थी | श्रन्त में देखा जाए तो जो चीज़ हमे श्रपना मानसिक
_ संतुलन ठीक रखने दौर श्रपना श्राचरण सभ्य बनाएस्खनेमे सहायता देती हैः वह दै दूसरे लोगे के साथ हमारा` सम्बन्ध |
बच्चे कया पढ़ें श्रौर क्या न पढ़ें, इस सम्बन्ध मेंकिसी किस्मकी रोकथाम करने की कोशिश करना वां
` नौयहो भी, प्र् बेकार है । यदि सामान्य बच्चे पर साहित्यका असर उतना ही ज्यादा पड़ता हो जितना कि उसके..... माता-पिता समझते हैं, तो शायद हमें उनके किताबें पढ़ने
पर ही पाबंदी लगा देनी होगी । एक श्मादमी ने सुभे बतायाकरिः बचपन मे पिरामिड के निमीण के चित्र देखकर उसे
` दासो म दिलचस्पी पेदा हदं थी श्रोर उसे उनकी व्यथा
को देखकर श्रानंद मिलता था। तोक्या इस कारण हइतिहास की पुस्तकों पर पाबंदी लंगाबहुत से लोग:
बताते हैं: कि बचपन मैं वे यौन-ज्ञान के लिए बाइबिल का.
का लेविटिकस बाला भाग हूँ ढा करते थे और उन्हें ओ्रोनानम
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|बहुत श्रानन्द मिलता है । हम सभी को यह जानकर व्रत
सुख मिलता है कि क्रिसी दूसरे की भावनाएं भी हमारी
जैसी हैं। हमें इस बात से भी भयभीत नहीं हो. जाना
चाहिए कि बचपन से पढ़ा जाने वाला साहित्य बने को
कुमाग पर लगा देगा : क्योकि, जैसा कि मिव्यन से कहां
है, “शिक्षा का प्रमाव शायद ही कभी बहुत गहरा होता है४५५९अलावा उन सुखद परिस्थितियों के जबकि उसकी कोएका^ थेतावश्यकता नहीं रह जाती |”ययपि पुस्तवा को इस बात का दोप सहीं दिया जा
सकता कि उन्हें पढुकर भ्ये कुमाय पर् लग जातेषु या
उनसे मानसिक उद्ग उत्पन्स होता है. फिर थी हमारी
भावनाओं पर उनका प्रभाव पढ़ता ही है । यह बात ग्रकुल सम्भव है. कि बहुत से प्रोद लोग किसी-न-किसी ऐसी
पुस्तक या किसी पुस्तक के ऐसे विवरण का उल्लेख श्रवकर सकते हैं जिसने उन्हें बचपन में विशेष रूप से प्रमाबितकिया था । इस प्रकार के दृश्य वपां तक मानस-परट पर
अंकित रहते हैं । मेरा श्नुमान यह है कि एस प्रकार केदृश्य किसी-ननकिसी रूप में बच्चे की किसी एसी मानसिकस्थिति को प्रति निभ्वित तरतं नं जिसका ब्भ करौ अषु भप
पूरा श्रामास नहीं होता |प्रकाशन समाचार८: द श: वन. रः द अ साधक: रोग

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