भारत में दुर्भिक्ष | Bharat Mein Durbhiksh

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Bharat Mein Durbhiksh by प्रो. राधाकृष्ण झा - Prof. Radhakrishna Jha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१५ 8 3 सन्‌ | देश्मे भव्ररी मो | विदेशोंको भेजा गया पड के | है; | ६ ६४८ २३८ १९१६१५७ ४९५. २९० १९१७.-१८ ७७०८ ४५९०१ सर्यात्‌ यहेँकी कमीका कुछ भौ व्यान न रल कट यौरोकि पेट भरनेश्ठः नै] वना दोने ध्र भी चार ३१ माधे सन्‌ १९२१ ६० तचार ख टन गेहं मारते बिदेशक्तो भेजनेरी आहा सरकारने निकाली है है ततने दुःखकी बात दे कि सरकारको, भारतवपैको रक्षाकी कोई आवश्यकता दीं शात दोती 1! इस वर्ष वर्षा न दोनेसे देशमें अनकी बढ़ी भारी मीरा है; मानक दुर्मिशके चिन्द इषि सा रदे दें । इतने पर भी भूखे भारतरे मुखा ` सि छीन कर अपने सगे भाई-पन्पुओको दमारी मा-पाप सरकार ( | ) ना दृ दर कट चिठाना चादती हे कि उन्दें बददज्मी मिटानेके छिये [चङ्क गोली खाने तकको भी जगद न रद जावे | इस प्रकारकी सरकारकी परमयुद्धिको देख कर कब तक देय रखा जा सकता दै { ^ भूखे मजन न दोव गोपाठा ” बाली कहावत भज चरितार्थ दो रदी दै । भृशो रद कर किसी भर्नरकौ ही मक्ति नहीं दो सकती । थादे बद ईश्वभक्ति हो, राज्यमक्ति हो या शभक्ति । बतमान स्रराउय आान्दोलनके अपराधी इस भारतवासी नहीं है। में आागइयरताने ऐसा करनेके लिये विवश किया है । स्वतंत्रता मनुष्यका एमसि सपिकार दें । फोई मनुष्य भे दो कुछ समय लिये किसीका गुलाम * !नां रे; परंतु यदद दिठकुठ संभव नहीं कि बद सदा-सर्वदा उसकी गुलामी हो वा रहे । सौर उसके अन्यायों तथा अत्याचारोंको इं्वरन्काये समझ कर सदता ६ भोर पूवर भी नहीं करे ! भारतमें, दुर्मिशके कारण हुई इन सपोगति- पे समूल नष्ट करनेझे स्थि एक मात्र उपाय स्वाधीनता है, और उसझे तिका मारे बतेमान, राजनीतिक स्टसस्य शयम्दाउन हूं 1... ' , _ 1. यशा ए वेदमय माद मावा दै,रषमे प्राश दररदे राजा ढी प्रन है;-- _




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