कला और आधुनिक प्रवृत्तियां | Kala Aur Adhunik Pravrattiyan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ कला श्रौर श्राधुनिक प्रवृत्तिर्यां मेरा ख्याल है, बड़ा मुश्किल है । श्राप स्वयं विचार करें, श्राप में और बालक में क्या अन्तर है ? सदिर्यां बीत गयीं, युग बीत गये । मनुष्य का रूप, रंग, चाल-चलन, भ्राचार-विचार सब कुछ बदल गया । बुद्धि का विपूल विकास हृग्रा । मनुष्य परमाणु शक्ति के बल पर शीघ्र ही चन्द्रलोक में पहुंचनेवाला है, परन्तु श्राज भी चित्र को वस्तु समझने का भ्रम बना है । श्रपनी जगह है । यूरोप के विद्व-विख्यात कलाकार सूवेन्स ने ऐसे चित्रों का निर्माण किया जिनमें शरीर के भ्रंग, जीवित लहू-युक्त मांस-पेदिय-से प्रतीत होते हं रौर उन्हें छकर देखने की भ्रनायास इच्छा होती है । भारतवषं मे एसी कला तो दृष्टिगोचर नहीं हो सकी, पर राजा रवि वर्मा ने इस श्रोर प्रयास किया था । भ्रौरभी इस प्रकारके चित्रकार थे, श्रौर हैं, यद्यपि उतनी सफलता उन्हें प्राप्त नहीं हुई । हमारे समाज में भी अधिकतर व्यक्ति चित्र का यही शभ्रादर्श राज भी मानते हैं श्रौर कलाकार से ऐसी ही ग्राशा करते हैं । क्या में कहूँ कि बालक, गौरया ग्रौर मनुष्य की प्रकृति चित्र के प्रति झ्राज भी एक-सी है ? हम चाहते हैं कि चित्र ऐसा हो जो वस्तु का आम उत्पन्न कर सके । चित्र में किसी वस्तु का ऐसा चित्रण हो जो हमें भ्रम में डाल दे भर चित्र में बनी वस्तु हम वही वस्तु समझ सकें । ग्राधुनिक कलाने हमारी इस प्रकृति के बिलकुल विपरीत कदम उठाया है-हमारा अआम ही हमसे छीना जा रहा । कँसे हम श्राधुनिक कला का ्रादर कर सकते है ? भारतवर्ष में यद्यपि और बातों में मति-भ्रम हुमा है, परन्तु भारतीय प्राचीन चित्रकला का इतिह्‌।स प्रमाण है कि इस भ्रम मे पडने का यहां कभी प्रयत्न नहीं हृश्रा । प्राज यूरोप तथा ग्न्य पादचात्य देशों में भी झ्राधुनिक कला ने इस भ्रम के विरुद्ध मोर्चा बना लिया है । चित्रकला स्वाभाविकता से कहीं दूर पहुँच गयी है । चित्र चित्र है, वस्तु वस्तु है । दोनों एक नहीं हैं । हाँ, वस्तु का भी चित्रण हो सकता है, होता श्राया है, हो रहा है भ्रौर भविष्य में भी होगा । श्रब प्रश्न यह है कि कया वस्तु का ही चित्रण करना कला है ? ऐसा समझा जाता था श्रौर श्राज भी लोग ऐसा ही समझते हैं । चित्र दाव्द का सम्बोधन करते ही प्रद्न उठता है, किस वस्तु का चित्र ? किसी जीव, पदार्थ या वस्तु का चित्र ? यह समझना एक परम्परा-सी हो गयी है । यही परि- भाषा बन गयी है-चित्र किसी वस्तु का होता है श्रर्थात्‌ चित्र रेखा, रंग, रूप के माध्यम से किसी वस्तु का चित्रण होता है । चित्र वस्तु का चित्रण न होकर श्रौर वया हो सकता है ? वस्तु-चित्रण ही कला है, ऐसा श्रधिकतर लोगों का ख्याल है ¦




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